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Friday, June 10, 2016

एक मीठी याद !

आर. डी. भारद्वाज " नूरपुरी "

बहुत समय पहले की बात है , वर्ष 1980 की , तब मैं जालंधर अपने गाँव में रहता था और एमए इंग्लिश कर रहा था , मेरे प्रथम वर्ष की वार्षिक परीक्षा हो चुकी थी ! एक दिन मैं अपने घर के बाहर गली में बैठा अख़बार पढ़ रहा था और मेरे पिता जी एक चारपाई पे पास ही बैठे थे , उस दिन उनकी छुट्टी थी ! थोड़ी ही देर बाद हमारे गाँव का पोस्टमैन आया ! मुझे तो पता था की यह हमारे गाँव में नया ही आया है, लेकिन पिता जी उस दिन उसको पहली बार देख रहे थे ! हमारे पास आकर उसने अपनी साइकिल रोकी और अपने थैले में से एक चिठ्ठी निकालकर मुझे पकड़ाई ! पिता जी ने पोस्टमैन से पूछा , "लगता है इस गाँव में नए आए हो और तुम्हारी यह नौकरी भी नई २ ही है !" जवाब में डाकिए ने उत्तर दिया ,"जी हाँ ! मैंने पिछले महीने ही नौकरी ज्वाइन की है , अभी तो मुझे केवल एक महीन ही हुआ है । !" पिताजी ने दूसरा सवाल किया , "आपका नाम क्या है ?" "जी ! श्रावण कुमार " पिता जी फिर सवाल किया , "कितना पढ़े लिखे हो ?" पोस्टमैन बोला , " जी मैंने एमए हिस्ट्री की है , दरअसल , मैं तो यह नौकरी करना ही नहीं चाहता था , लेकिन पिता जी ने जोर दिया कि सरकारी नौकरी है , इसे छोड़ना नहीं है !" मेरे पिता जी ने भी अपनी राय देते हुए कहा , "तुम्हारे पिता जी ने तुझे बिलकुल सही समझाया है , नौकरी करनी ही चाहिए , एक तो इसके बाद अपने बाप से जेब खर्च मांगना बंद कर दोगे , और फिर तुम्हारा आत्मविश्वास भी बढ़ेगा ! एक और बात भी है , तुम्हारी पढ़ाई अच्छी है , देर सवेर तुम्हें और अच्छी नौकरी मिल ही जाएगी , तब तक यह नौकरी भी बुरी नहीं है , जब तक तुम्हें कोई और बेहतर नौकरी नहीं मिलती , यह काम करते रहो , इसमें कोई मुश्किल भी नहीं है !" "जी हाँ ! चाचा जी ! मैं भी अच्छी नौकरी के लिए तैयारी कर रहा हूँ , जैसे ही कोई बढ़िया नौकरी मिलेगी , मैं इससे छोड़ कर तुरंत भाग जाऊँगा " इतना कहते ही पोस्टमैन ने पिता जी को नमस्ते बोला और मेरी तरफ हाथ हिलाते हुए बाए २ करते हुए वह हमसे विदा लेकर चला गया !

क्योंकि श्रवण कुमार मेरे से केवल थोड़ा ही बड़ा था , हमारी थोड़ी दोस्ती हो गई और वह आते जाते मुझे मिलता भी रहता था और अब तो वह मेरे साथ अपने घर की बातें , निजी समस्याएँ इतयादि भी बाँट लेता था ! थोड़े ही दिनों बाद वह फिर मुझे मिला , लेकिन उस दिन उसके चेहरे पर ख़ुशी नहीं थी ! मैंने उसे लस्सी पिलाई और उसकी परेशानी जानने की कोशिश की , जवाब मैं उसने बताया कि उसकी बहन की शादी आ रही है , मैंने उसे बधाई देते हुए कहा कि यह तो ख़ुशी की बात है , मगर तुम उदास , परेशान क्यों हो ?" फिर उसने इसका राज खोला और बताया की एक महीने बाद उसकी बहन की शादी है , पिताजी की नौकरी प्राइवेट है और उनको ज्यादा छुट्टी नहीं मिल सकती , शादी से सम्बंधित तो घर मैं बहुत से काम होते है , खास तौर पे अगर घर में लड़की की शादी हो ! कितनी सारी खरीददारी करनी होती है , बहन के लिए दहेज़ का सामान लेना है , बहुत से कपड़े लत्ते भी खरीदने हैं , जेवर इतयादि भी , लेकिन पिताजी के बॉस उनको एक हफते से ज्यादा छुट्टी नहीं दे रहा है , ऐसे हालात में पिताजी मुझको कहते हैं कि मैं आठ दस दिन की छुट्टी लेकर , माँ और बहन को साथ लेकर धीरे २ पूरी खरीददारी कर लूँ ! मैंने कल भी अपने बड़े बाबू जी (दफ्तर में उसके बड़े कर्मचारी ) से निवेदन किया था , लेकिन वह भी मुझे दो / तीन दिन से ज्यादा छुट्टी देने के लिए तैयार नहीं है , कहते हैं कि मेरी अभी तो नौकरी शुरू हुई है , मेरी इतनी छुट्टी बनती ही नहीं है , दूसरी बात यह है कि अगर दो तीन दिन की छुट्टी मैं अभी शॉपिंग करने के लिए ले लूँ , तो शादी के लिए और छुट्टी कैसे मिलेगी मुझे ?'

श्रवण कुमार की समस्या तो गम्भीर थी , लेकन फिलहाल इसका कोई हल नज़र नहीं आ रहा था ! क्योंकि अब तक वह डाकिया मेरा दोस्त बन चूका था , तो उसकी परेशानी मुझे भी परेशान कर रही थी , मैं भी सोच में पड़ गया कि इसकी सहायता कैसे की जाये ? अब वह पोस्टमैन लगभग रोज ही मुझे मिलता था , हमारी कोई चिठ्ठी आई हो या न , वह मेरे घर का दरवाजा खटका कर , मुझे मिलकर ही जाता था ! फिर एक दिन मुझे एक ख्याल आया , दूसरे दिन जब वह डाक लेकर आया , तो मैंने उसके साथ बात की , कि मेरे पास उसकी समस्या का एक हल तो है , अगर उसका बड़ा बाबू इसमें कोई अड़चन पैदा ना कर दे , तो श्रवण कुमार की सहायता हो सकता है और वह अपनी बहन की शादी की तमाम खरीददारी भी अपनी माता जी के साथ कर सकता है और शादी के लिए भी उससे छुट्टी मिल सकती है ! मेरी बात सुनकर उसके चेहरे पर थोड़ी चमक आ गई और उसने बड़े उत्सुकता से पूछा , "कैसे ?" अपनी सलाह उसे समझाते हुए मैंने उससे कहा की अभी जो दो तीन दिन की उसे छुट्टी मिल सकती है , वह लेकर वह अपनी माता जी और बहन के साथ शॉपिंग कर ले ! शादी से चार दिन पहले और तीन चार दिन बाद में उसकी जगह मैं गाँव अनाधिकारिक तौर पे डाक मैं बाँट दूँगा , ऐसा करने से उसके दफ्तर का काम भी नहीं रुकेगा और घर की जिम्मेदारी भी निभ सकती है ! सुनकर वह खुश तो हो गया , लेकिन उसने अपनी प्रतिकिर्या देते हुए कहा , "क्या बड़े बाबू जी इसके लिए मान जाएंगे ? क्योंकि सरकारी ड्यूटी तो मेरी है , बाबू जी बाँटने के लिए तुझे चिठियाँ और और बाकी सरकारी कागजात कैसे देंगे ?" मैंने अपनी तरफ से उसको दिलासा देते हुए सुझाव दिया कि वो कल अपने बड़े बाबू जी से थोड़ा आराम से बात करे , हो सकता है कि वह तुम्हारे घर की तमाम समस्या / हालात समझकर मान ही जाएं , बस तुम थोड़ा आराम से और धीरज से बात करना !

दूसरे दिन श्रवण कुमार ने अपने बड़े बाबू जी से अपनी छुट्टी की बात की और साथ यह सुझाव भी दिया की उसकी छुट्टी की वजह से सरकारी काम नहीं रुकेगा ! बड़े बाबूजी ने पहले तो सुनकर सिरे से ही इस सुझाव को ठुकरा दिया लेकिन उसने बार २ अनुरोध करने पर वह इस पर विचार करने के लिए तैयार हो गए ! श्रवण से उन्होंने कहा कि पहले वह अपनी आज की ड्यूटी पूरी करे फिर कल शाम को इसके बारे में गम्भीरता से सोचेंगे ! इधर मैं भी अपने घर बैठा इंतज़ार कर रहा था के उस डाकिए के बड़े बाबूजी ने हमारी तज़वीज़ के बारे में सकारात्मिक भाव से विचार करने को मन बनाया है या नहीं ! बारां साढ़े बारां बजे के करीब वह डाकिया हमारे घर की तरफ आया करता था , तो मैं भी अपने स्टडी रूम का दरवाजा, जोकि गली की ओर भी खुलता था ) ,दरवाज़ा खुल्ला रखकर वहां बैठा उसका इंतज़ार कर रहा था ! जब उसके साइकिल की घण्टी बजी तो मैं भी जल्दी से बाहर आया और बिना कोई भूमिका बाँधे उससे सीधा सवाल किया , "क्या तुम्हारे बड़े बाबू जी मान गए ?" जवाब में वह लड़का थोड़ा मुस्कराया और फिर मेरे साथ हाथ मिलाते हुए बोला , "लगता है हमारी बात बन जाएगी ........ बाबू जी ने कल शाम को बात करने के लिए बोला है , मेरा ख्याल है वह तुम्हारे साथ भी बात करेंगे , तो इस शनिवार को तीन बजे के बाद तुम पोस्ट ऑफिस जरूर पहुँच जाना , पूरी बात तुम्हारी हाज़िरी में ही होगी !" मैंने अपनी तरफ से फिर उसे दिलासा दिया , "यार चिन्ता मत कर ! तेरा काम हो जायेगा , देख लेना तुम्हारी बहन की शादी में किसी भी तरह की कोई रुकावट नहीं आएगी ! बस तुम भगवान पर भरोसा रखो । "

शनिवार को श्रवण कुमार के बुलावे अनुसार मैं डाकखाने पहुँच गया ! श्रवण और बड़े बाबू जी वहाँ मौजूद थे ! बड़े बाबू ने बिना कोई भूमिका बांधे बात शुरू की , "मैंने आपको इस गाँव के डाकिए - श्रवण कुमार के कहने पर बुलाया है । श्रवण की बहन की शादी आने वाली है , जिसके इसे चार दिन अब और फिर एक सप्ताह की अगले महीने शुट्टी चाहिए , क्योंकि इसकी नौकरी तो केवल ३५/४० दिन की हुई है, दफ्तर के नियमों अनुसार इसको शुट्टी नहीं मिल सकती ! श्रवण का कहना है कि इसने आपसे बात कर ली है और आप इसकी जगह डाकिए का काम करने के लिए तैयार हो ! क्या यह बात सही है ?" मैंने कहा , "जी हाँ ! बिलकुल सही है , क्योंकि शादी भी बहुत बड़ा फंक्शन है , जिसमें काम बहुत होते हैं और यह घर का बड़ा बेटा होने के नाते इसकी घर प्रति भी जिम्मेवारियाँ हैं , अगर आपकी कृपा से इसे छुट्टी मिल जाये , और इस परेशानी की घडी में मैं इसके कुच्छ काम आ सकूं तो यह मेरा सौभाग्य होगा , मुझे बहुत ख़ुशी भी होगी !" सुनकर बड़े बाबू ने अपनी सविकृति के रूप में सर हिलाया और विस्तार से मुझे समझाना शुरू किया ," वैसे तो सामान्य स्थिति में ऐसा करना संभव नहीं होता , लेकिन मैं पूरे हालात को समझता हूँ , इस लिए कुच्छ बातें तुम दोनों को समझाना आवश्यक हैं ! श्रवण की गैरहाज़िरी के दिनों में मैं तुम्हें जिम्मेदारी देने के लिए सहमत हूँ , लेकिन इस बात का ध्यान रखना कि यह पूरी व्यवस्था एक गोपनीय करवाई की तरह ही होगी ! हम आपको बाँटने के लिए चिठियाँ तो दे देंगे , लेकिन पार्सल और मनी आर्डर वगैराह नहीं देंगे ! गाँव में जिसका भी पार्सल या मनी आर्डर उन दिनों आएगा , मैं तुम्हें कागज़ पर उसका नाम और पता लिखकर दे दूँगा और तुम जाकर उस घर में सन्देश देना के वह अपना पार्सल वगैराह डाक खाने में आकर प्राप्त कर लें ! ऐसा करने से दफ़तर का काम भी नहीं रुकेगा और श्रवण अपनी बहन की शादी में अपनी जिम्मेवारियाँ भी निभा सकता है !" और फिर मेरी देखते बोले , "क्या तुम्हें मंजूर है , एक और बात , गाँव में किसी को भी इसके बारे इसके बारे में कुच्छ नहीं बताना !" मैंने पूरी बात समझते हुए उत्तर दिया , "जी हाँ ! मुझे सब मंजूर है , गाँव में यह बात मैं किसी को नहीं बतायूँगा !"

थोड़े दिनों बाद श्रवण कुमार इस इंतेज़ाम पर अमल करते हुए छुट्टी पर चला गया और ऐसे मैंने उसकी जगह डाकिए का कामकाज सम्भाल लिया ! पहले दिन ड्यूटी पर जाने से पहले मैंने अपने घर अपने माता पिता को बता दिया था , मेरे माता पिता को यह सब जानकर प्रसन्नता हुई ! क्योंकि वह मेरा अपना ही गाँव था , लगभग पूरे गाँव को मैं जानता ही था , गाँव की लगभग सारी गलियाँ मेरी देखी भाली ही थी ! सुबह दस बजे बाबू के समझाए अनुसार मैं पोस्ट ऑफिस पहुँच गया ! सारी चिठियाँ गाँव की गलियों के क्रम से मैंने लगा ली , पहले दिन कोई पार्सल वगैराह नहीं था , केवल चिठियाँ या किसी किसी २ सज्जन की मैगज़ीन ही थी ! सारी डाक लेकर जब मैं बाँटने के लिए निकला और पहली चिठ्ठी देने से पहले आवाज देनी थी , "पोस्टमैन !" वह थोड़ा अजीब सा लगा , लेकिन दिल में केवल एक ही बात मैंने पक्के तौर पे ठान रखी थी कि मैंने अपने दोस्त की सहायता करनी है ! मैं जिधर भी जाता और मेरे कंधे पर चिट्ठियों का भरा हुआ थैला लटकते देखकर मेरे गाँव के लोग पूछते , "अरे आरडी ! तू डाकिया बन गया , वोह भी अपने ही गाँव में - सुनकर अच्छा लगता , मैं उनकी हाँ में हाँ मिलाता जा रहा था ! किसी को विस्तार से कुच्छ नहीं बताया , गाँव मैं , गली गली साइकिल पर मैं पहले भी बार नहीं घूमा था , लेकिन आज चिठियाँ बाँटते २ घूमने का आनंद ही कुच्छ और था ! पता ही नहीं चला कब दो ढाई बज गए और मैंने अपने पहले दिन का पूरा काम निपटा दिया ! सारी चिठियाँ बाँटने के बाद बाबू जी को रिपोर्ट करने जब मैं वापिस पोस्ट ऑफिस गया , तो वोह सुनकर खुश हुए मुझे प्यार से समझाते हुए बोले , "बहुत अच्छा किया ! कल भी इसी तरह सुबह दस बजे पोस्ट ऑफिस पहुँच जाना !

अगले दिन फिर मैं ड्यूटी पर गया और काम शुरू कर दिया , पहले डाकखाने से बड़े बाबू जी से चिठियाँ लेनी , उनको गाँव की गलियों के हिसाब से चिठियाँ सेट करना , और फिर गली २ घूमकर लोगों को चिठियाँ बाँटना ! अगर किसी सज्जन का पार्सल या मनी आर्डर आता , तो मैं उसका नाम एक कागज़ पर नोट कर लेता और चिठियाँ बांटते २ उसके घर सुचना दे देता कि आपका मनी आर्डर आया है और डाकखाने में जाकर बड़े बाबू जी से प्राप्त कर लेना ! घूमते २ ज्यादातर लोग अच्छे २ कमेंट्स ही करते थे , कुछ अनपढ़ या कम पढे-लिखे लोग अपनी प्राप्त हुई चिठ्ठी को पढ़ कर सुनाने के लिए भी कहते जो कि मैं ख़ुशी २ कर देता ! कोई और बोलता कि दो तीन दिनों में इसका उत्तर भी देना है , समय निकालकर घर आना और हमारी चिठ्ठी लिख देना , तो ऐसे किसी २ की चिठ्ठी भी लिखने को मिलती , और यह पूरा काम होने के बाद कोई मुझे लस्सी पिलाता तो कोई चाय के लिए पूछता , तो कोई और लडडू / बर्फी इतयादि खाने को भी दे देता ! तो ऐसे करते २ आठ दस दिन कैसे बीत गए , कुछ पता ही नहीं चला , क्योंकि मेरे वार्षिक पेपरों के बाद यह मेरी छुटियाँ ही चल रही थी , तो मेरी पढ़ाई का भी कोई नुक्सान नहीं हुआ , बल्कि मेरी वह दस छुटियाँ बड़े ही अच्छे और एक अलग ही ठंग से बीती !

दूसरी तरफ मेरा दोस्त अपनी बहन की शादी भी अपने मन माफिक ठंग से आनन्दपुर्विक कर पाया , मुझे इस बात की ख़ुशी और सन्तोष भी था ! श्रवण अपनी बहन की शादी से फ़ारिग़ होकर जब वापिस अपनी ड्यूटी पर आया तो उसके चेहरे पर जो प्रसन्नता की लहर मुझे नज़र आई , उसका नज़ारा कुच्छ शब्दों में बयान करना थोड़ा मुश्किल है , मुझे लगा कि जैसे उसके चेहरे की ख़ुशी से मुझे मेरा इनाम मिल गया ! उसने पूरे जोश से मुझे जफ्फी डालकर जो मेरा धन्यवाद किया , वह मुझे आज भी इतने वर्ष बीत जाने के बाद याद है ! फिर उसने अपने चिठ्ठियों वाले थैले में से एक मिठाई का डिब्बा निकाला और मुझे थमाते हुए बोला , "धन्यवाद दोस्त ! आपने मेरी इस मुश्किल भरे हालत में मेरा साथ निभाया , इसके लिए आपका बहुत २ धन्यवाद !" ना जाने क्यों और कैसे मेरी भी जुबान से यह शब्द सहसा ही निकल पड़े और मैंने उसके शब्दों में संशोधन करते हुए उत्तर दिया , "अगर तू यह मिठाई मुझे धन्यवाद देने के लिए दे रहा है , तो मुझे स्वीकार नहीं है, वापिस लेजा इसे, लेकिन अगर तू अपनी बहन की शादी की ख़ुशी मैं खिला रहा है , तो मैं इससे ख़ुशी २ कबूल करता हूँ ! " मेरी बात सुनकर श्रवण कुमार की आँखें आँसूयों से भीग गई और मेरा दिल इसकी ख़ुशी से , कि चलो अच्छा हुआ , भगवान ने मुझे किसी के काम आने का इक सुअवसर तो प्रदान किया , और ज़िन्दगी ने मुझे एक अच्छे तजुर्बे से भी रू-ब-रू करवा दिया !

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