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Tuesday, May 17, 2016

हमारा वोट का अधिकार - एक फ़र्ज़ भी !


आर. डी. भारद्वाज " नूरपुरी "

जितनी मेहनत हम लोग एक रेहड़ी वाले से आलू , प्याज ,टमाटर , हरी मिर्च या फिर धनिया इतयादि चुनने और खरीदने लगाते हैं , अगर हम इससे आधी मेहनत भी अपने नेता चुनने में लगाएं , चुनाव लड़ने वाले सभी नेताओं के बारे में जानकारी हासिल करें , उनकी पुरानी कारगुजारियाँ की ध्यान से जाँच पड़ताल करें , उनका निरीक्षण करें , उनके चल रहे कोर्ट केसीज़ का हिसाब किताब देखें , और यह कुच्छ करने के बाद ही विवेकशीलता से यह फैसला करें कि हमें किसको वोट देना है , सबसे उत्तम कौनसा प्रतियाशी रहेगा , यह सब कुच्छ तह करने के बाद ही अपनी बेशकीमती वोट डालना सिनिश्चित करें , और लाज़मी तौर पे कमसे काम ९० प्रतिशत वोट डालें , तो हमारे देश में भी सुधार आ सकता है ! आम नागरिकों को मिलने वाली सुख सुविधाएं काफी हद तक बेहतर हो सकती हैं और हमारे गाओं - २ , शहर शहर मैं प्रस्थितियाँ बदल सकती हैं !

मुझे यह बात इस लिए लिखनी पड़ रही है कि मात्र दो दिन पहले ही दिल्ली मैं म्युन्सिपल कउंसल्लर के लिए चुनाव हो रहे थे , पिछले ही इतवार को , उस दिन मैंने वोट डालने जाने के लिए अपने आस पास के 8 / 10 लोगों को कहा कि चलो वोट डाल आते हैं , लेकिन लगभग सब ने ही जवाब दिया - "छोडो यार क्या करना है / इतनी गर्मी है / वहाँ जाकर हमें क्या मिलेगा / हमारा कौनसा कोई रिश्तेदार चुनाव रहा है ? वगैराह - २" ! सबने ऐसी ही प्रतिकिर्या देकर वोट डालने से पीछा छुड़वा लिया ! हालाँकि वोटिंग सेंटर हमारी कॉलोनी से केवल एक किलोमीटर की ही दूरी पर था ! इसका नतीजा यह हुआ कि हमारे मटियाला चुनाव क्षेत्र में केवल ३३.४ % ही वोटिंग हुई , इसके बाद नागरिकों को मिलने वाली सुख सुविधायों / सहूलतों - जैसे कि पीने का साफ़ सुथरा पानी , बिजली , टूटी फूटी सड़कों की मुरम्मत , स्ट्रीट लाइट्स , पार्कों में - घास लगाना , समय २ पर पानी देना बच्चों के लिए झूले , पेड़ पौदे , कम्युनिटी सेन्टर , डिस्पेंसरी , पाठछालें , मार्किट इतयादि , और सड़कों और गलिओं से कूड़ा कचरा उठाना , वगैराह - न जाने कितने काम होते हैं , सभी कामों के न होने पर बाकी ६६.६ % लोगों को , जिन्होंने पिछले सन्डे को वोट डालने की कोशिश ही नहीं की , उन लोगों को बाद मैं शिकायतें करने या फिर नेताओं गाली देने का कोई अधिकार नहीं रह जाता , क्योंकि जैसे वोटर अपने वोट डालने की जुम्मेवारी से कतराते रह गए हैं , इसके प्रति लापरवाही से काम लेते हैं , बिलकुल इसी प्रकार चुनाव जीतने के बाद नेता लोग भी अपने फ़र्ज़ के प्रति उदासीन हैं , लोगों की जरूरतों की उन्हें भी कोई चिन्ता या सचेतता नहीं रहती है ! इस मामले में दोनों में कोई खास अन्तर नहीं है ! लोग भूल जाते हैं कि वोट डालना यहाँ एक अधिकार है , वहीं पर यह हमारी एक जिम्मेदारी भी बनती है !

कृपया याद रखें - एक बहुत बड़े राजनैतिक चिन्तक व विश्लेशिक ने बहुत वर्ष पहले लोकतंतर की सफलता के बारे में एक बहुत ही सटीक बात कही थी - निरन्तर सजगता ही लोकतंतर की सफलता की गारन्टी है ! यहाँ वोट डालने में हमने अपने फ़र्ज़ के प्रति लापरवाही बरती , वहीं पर नेताओं ने पूरे देश और समाज के प्रति अपनी जिम्मेवारियाँ भी भूल जानी हैं और देश को लूटना शुरू कर देना कर देना है ! बाद में वहाँ की जनता चाहे कितना भी रोती कुरलाती या शोर मचाती रहे ! क्योंकि सोई हुई जनता को लूटना और खुले पड़े ख़ज़ाने में सेँध लगाना तो बहुत ही सरल काम होता है !

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