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Wednesday, April 13, 2016

झूठी मेरिट के ढकोंसले !

आर.डी. भारद्वाज " नूरपुरी "

गुरु द्रोण की फौज कहलाने वाले, परशुराम से शिक्षा पाने वाले,
तुम क्या जानो मैरिट को, तुम तो सदियों से आरक्षित हो ।
क्योंकि तुम्हारे और तुम्हारी हज़ारों पीढ़ियों के लिए तो
नौकरियां , व्यवसाय , कोठियाँ , खेतीबाड़ी की जमीने, बाग़ - बगीचे
और नौकरशाही - सब कर दिए थे आरक्षित उस मनु महाराज ने !
और तब से कानून करवा दिया लागू , देश और पुरे समाज में !

अर्जुन की भी खूब चल निकली थी, बना दिया धोखे से सर्व श्रेष्ठ धनुर्धर,
छल्ल कपट से काट दिया वो चनौती वाला अंगूठा मेरिट का ,
क्योंकि एकलव्य तो था बेटा एक दलित का,
और तुम तथाकथित श्रेष्ठ कुल वाले , राज घराणों मेँ
जन्म लेने वालो, कैसे कर लेते स्वीकार एक दलित को ,
अपने से अधिक बुद्धिमान, शक्तिमान , अपने से अधिक श्रेष्ठ !

फिर बिन चुनौती सविकारे ही वंचित किया एक सूत पूत्र (कर्ण) को ,
परिस्थितिवश बर्ह्मास्त्र के प्रयोग से,
क्या यही है तुम्हारी संस्कृति, यही है तुम्हारी सभ्यता ?
क्या ऐसे ही मुकाबला करते आए हो प्रतिस्पर्धियों से ?
यहाँ निम्न वर्ग को न्याय नहीं , सम्मान नहीं ,
समानता का अधिकार नहीं, इज्जत नहीं,

उनके लिए तो कर दिए थे बंद सब गुरकुलों के दरवाज़े,
और छीन लिए थे उनके सब सुख और साधन ?
फिर वह कैसे और कहाँ निखारते अपने भीतर छिपी
कला को , बुद्धि और अनेकों व्यवसाय चलाने बारीकियों को,
रण कौशल को ? राजनैतिक , सामाजिक और आर्थिक अधिकारों से वन्चित -
कैसे वोह पाण लगाते अपने अन्दर छलकते फन को ?
और न जाने कितने क्षेत्रों में कैसे करते अपने को तीक्ष्ण ?

शर्मसार किया तुमने हज़ारों बार मानवता को ,
झूठे जाति और धर्म के फन्दों से, और न जाने कितने पाखण्डो से ,
कभी डोनेशन, कभी व्यापम और सिफारिश के कुचक्रों से ,
कभी मैनेजमेंट कोटा की सीटों से ,
हमेशा घुसते आए हो इन चोर दरवाजों से,
कभी कॉलोजों में , युनिवर्सिटियों में, तो कभी सत्ता के गलियारों में ,
और फिर भी बड़े ही फ़ख़र से कहते हो, हम मैरिट हैं ?

याद रखो ! यह मैरिट नहीं, मात्र एक धोखा था ,
कल से नहीं, परसों से नहीं , साल दो साल से नहीं ,
यह धोखा तुम करते आये हो हज़ारों वर्षों से ,
धोखे से छीना उनसे , घर बार, खेत खलियाण ही नहीं ,
उनके लाखों पुरखों से , उनके जीवन यापन के सुख और साधन ,
उनके लाखों , लाखों रोजगार और व्यवसाय ,
उनके सम्मान और सामाजिक समानता के अधिकार ?
और इस निरन्तर छीना झपटी से कर दिया ,
उनको और उनके बच्चों को कंगाल , साधन और सत्ता विहीन !
कभी षडयन्त्र से किया वध शम्भूक का ,
तो कभी छल्ल से काटा गला शोंण का !

मगर अब नहीं है तुम्हारी चलने वाली ,
हमारा एक ही विद्धवान और वकील ,
तुम्हारे हज़ारों धोखेबाज़, लुटेरों पर बन बैठा भारी ,
क्योंकि झूठ के पाँव नहीं होते , सत्य तो होता है स्वंमभू बलवान ,
और अधर्मी होते हैं धोखा देने वाले , छल्ल कपट से हराने वाले ,
गलत नीतियों और पाखण्ड से दूसरों को छलने वाले ,
हमारे उस विद्धवान, जुझारू और समाज सुधारक ,
युग परिवर्तक मसीहा ने बदल दिया तुम्हारा सब धोखे और पाखण्ड का खेल ,
और लिख दिया, सत्य , निष्ठा, समानता और
सिद्धांतों पर आधारित एक नया संविधान !
क्योंकि वह जानता था - आर्थिक आज़ादी के बिना ,
अर्थविहीन ही है , राजनैतिक और समाजिक आज़ादी !

और अब हज़ारों वर्षों से दलित और शोषित
वर्ग के बच्चे ही पढ़लिख कर बदलेंगे अपनी तकदीर ,
और उनकी तदबीरों से बदलेगी पूरे भारत की तस्वीर ,
समझ सको तो समझ लो - वक़्त है अब भी ,
सम्भल सको सम्भल जाओ , वक़्त है अब भी ,
छोड़ दो इन साधन विहीन और संरक्षण विहीन
दलित वर्ग को , और छोड़ दो इन पर करने शोषण , अत्याचार और अन्याय !
मत भूलो ! यह भी इसी भारत माता के बच्चे हैं ,
और इनको भी बढ़ना है आगे ही आगे , और बने रहना है -
निरन्तर उन्नति, विकास और परविवर्तन की डगर पर अग्रसर !

और याद रखना ! जो देश - प्रदेश अपने नागरिकों के लिए नहीं बनाते,
समानता के अधिकार, नहीं देते बढ़ने , फलने फूलने के बराबर अवसर ,
और यहाँ लड़कियों और औरतों पर होते रहते है शोषण ,
माना जाता है उनको दूसरे दर्जे के नागरिक ,
वही देश पिछड़ जाते हैं सम्पूर्ण तौर पे अन्य प्रगतिशील और विकासशील देशों से ,
और उनको बनना पड़ जाता है प्रगतिशील देशों के पिछलगु -
विकास में , प्रगति में , विज्ञान में , और ना जाने कितने ही
प्रतिस्पर्धा की राहों में, पगडंडियों में और शेष दुनियाँ की निगाहों में !

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