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Tuesday, July 26, 2016

Shiksha Bharati Public School Organised academic counseling session


Shiksha Bharati Public School, Sector-7, Dwarka organised academic counselling session on 23rd July 2016 for Class X students and their parent regarding the betterment in scholastic achievement.

The Principal Ms Mamta Gupta welcomed all the parents and students. She appreciated the open view for opting ‘ CBSE Board Class X’. She opened her valuable words on benefits for board exam. It was keenly observed the involvement of the parents for the improvement in co-scholastic and scholastic graph, even some tips and techniques were discussed. Good parenting with values was also focused in the session.

Questionnaire session was held and positive interaction took place. The entire session was applauded by the parents with the grace of satisfaction. It was concluded with the vote of thanks given by the vice-Principal.

Kavi sammelan at Hindi Academy Delhi


दिल्ली की रेप घटना पे आधारित हिंदी फिल्म मर्डर माधुरी २९ जुलाई को रिलीज़


-प्रेमबाबू शर्मा

फिल्म ‘मर्डर माधुरी’ दिल्ली में हुए बस रेप की सत्य घटना पर आधारित फिल्म है। फिल्म में कुछ हाॅट सीन के अलावा गाली गलौच था,सेंसर को कुछ सींन्स पर अपत्ति थी,अंत में कुछ कट के बाद फिल्म 29 जुलाई को रीलिज की तैयारी में है। इस फिल्म में दीपशिखा, शरद सक्सेना, किरण कुमार, सोनाली जोशी, जिया खान,  विनय वर्मा, रजा मुराद और सुनिता राणा हैं। फिल्म का संगीत दिया है अरशद अहमद ने ,गीत लिखे हैं शाहिद हमदानी ,एक्शन सतीश का है ,एडिटर विजय पाल ,नन्दकुमरी हरी ,कहानी येरम शेट्टी साईं का है। फिल्म को इ फोर यू के इंटरप्राइजेज के अयूब खान रिलीज करेंगे। फिल्म में एक ही गीत है जिसे आशा भोसले ने गाया है।

श्रीमद्भगवद्गीता का भारतीय दार्शनिक विचारधारा में योगदान


मधुरिता  

भारतवर्ष दर्शनों की भूमि है । अनेक दर्शनों में से छः दर्शन मुख्य हैं। ये दर्शन ब्रह्म के साक्षात्कार करने वालों, साकारवादियों का भी है तो निराकारवादियों का भी । भगवदसत्ता मानने वालों की भी है तो उनकी सत्ता को नकारने वालों की भी । अणोरणीयाण से लेकर महतोर्महीयान-सभी लौकिक वस्तुओं की भी विवेचना का दर्शन है तो इससे परे का भी । भारतीय मनीषा केवल जानने मात्र से ही संतुष्ट होकर बैठता नहीं है बल्कि जानकर तथा मानकर उसे साक्षात्कार भी करता है, दर्शन भी करता है । अतः ये शास्त्र दर्शनशास्त्र कहलाते हैं । हमारा धर्म केवल कर्मकाण्ड, पूजा-पाठ, व्रत-उपवास ही नहीं है बल्कि इसके पीछे एक दर्शन भी है । ये दर्शन इस प्रकार हैं:-

न्याय दर्शन: महर्षि गौतम ने इसे प्रतिपादित किया था । अपने न्याय शास्त्र में उन्होंने भगवद् सत्ता के लिए प्रमाण, प्रमेय, संशय, प्रयोजन, दृष्टांत, सिद्धान्त, अवयव, तर्क, निर्णय, वाद इत्यादि सूत्रों का प्रयोग किया है।

वैशेषिक दर्शन: महर्षि कणाद ने इसमें पदार्थ विज्ञान तथा अणु सिद्धान्त का विस्तृत वर्णन किया है। इसमें भगवद् सत्ता का समर्थन किया गया है ।

सांख्य दर्शन: महर्षि कपिल ने सांख्य दर्शन का वर्णन भागवत में (3.25-33) किया है । ये दर्शन ज्ञान की महिमा का वर्णन करता है और इसी के द्वारा मोक्ष प्राप्ति का मार्ग बताते हैं।

पूर्व मीमांसा दर्शन: महर्षि जैमिनि के द्वारा प्रतिपादित हुआ है । आत्मा, परमात्मा, वेद, मोक्ष आदि की मीमांसा हुई है । ईष्वर के बारे में नहीं मानते हैं । परंतु इस पर अलग से विचार करने की आवश्यकता  है ।

उत्तर मीमांसा दर्शन: इसमें तीन दर्शन हैं - अद्वैत, विशिष्टाद्वैत तथा द्वैत । अद्वैत के प्रतिपादक आदिशंकर, विशिष्टाद्वैत के रामानुजाचार्य तथा द्वैत के माध्वाचार्य जी हैं ।

योग दर्शन: महर्षि पतंजलि योग दर्शन के जनक है ।

उपर्युक्त सभी दर्शनों के बारे में अलग से मीमांसा हो सकती है । अभी हम अपने प्रतिपाद्य विषय की ओर चलें ।

श्रीमद्भगवद्गीता जो गीता के नाम से प्रचलित है, विश्व के विलक्षण धार्मिक शास्त्रों में से एक है । गीता तो वास्तव में विश्वग्रन्थ ही नहीं, मानवग्रंथ भी है । ये विश्व के सबसे लम्बे महाकाव्य महाभारत के भीष्मपर्व में भगवद्गीता नामक अवान्तर पर्व के 25वें अध्याय से 42वें अध्याय में उल्लिखित है । सर्वप्रथम श्रीआदिशंकर ने श्रीमद्भगवद्गीता को महाभारत से निकालकर एक स्वतंत्र कृति के रूप में प्रकट किया । वेदांत के प्रस्थानत्रय में श्रीमद्भगवद्गीता का अनन्यतम स्थान है - अन्य दो हैं उपनिषद् और ब्रहमसूत्र ।

यद्यपि गीता की पृष्ठभूमि में कुरूक्षेत्र की युद्धभूमि है इसके द्वारा युद्ध से विमुख अर्जुन को युद्ध हेतु प्रेरित किया गया है | इसका युद्ध या लड़ाई या रक्तपात से वास्तविक संबंध के साथ-ही-साथ अपने जीवन के पवित्र कर्तव्यों के पालन से भी है, चाहे वे कितने ही अप्रिय क्यों न हों । भीषणतम् समस्याओं के झंझावातों में भी तनिक विचलित न होकर ‘मेरा स्मरण करो और युद्ध करो’ (8/7) का संदेश कितने ही हताश प्राणी के लिए प्रकाश-स्तम्भ के समान है और अगर युद्ध या संघर्ष से भी इसका वास्तविक संबंध हो भी तो क्या युद्ध हमारे जीवन का अंग नहीं है? युद्ध के विरोध में चाहे कितनी ही सुंदर अवधारणायें क्यों नहीं विकसित हुई हो परंतु है यह हमारे जीवन का अंग ही - इतिहास साक्षी है कि युद्ध के तुरंत बाद अन्याय का अंत हुआ - कई देशों ने जो धूल-धूसरित हो गये थे युद्ध में -उन्नति के शिखर को भी छुआ । प्रथम तथा द्वितीय विश्वयुद्ध भी इसका प्रमाण हैं । यह एक अलग विषय है । यहाँ पर हम युद्ध को संघर्ष के रूप में व्याख्यायित कर अपने आध्यात्मिक एवं सांसारिक जगत् को आलोकित करें-यही मेरी कामना है ।

आइये हम भारतीय दार्शनिक विचारधारा को आगे बढ़ाने में तथा इसे और अधिक लौकिक बनाने में श्रीमदभगवद्गीता के योगदान की विवेचना करें -

गीता का निष्काम कर्मयोग का सिद्धान्त
सतयुग में महान भागवत धर्म था जिसमें सभी प्राणी एक दूसरे में भगवद्दर्षन करते थे । त्रेता में बड़े-बड़े यज्ञों का प्रचलन था । इसके बाद द्वापर में कर्मकांडो का प्रचलन हुआ । त्रेता तथा द्वापर में यज्ञों तथा कर्मकाण्डों द्वारा सांसारिक सुख की प्राप्ति की कामना होती थी । परंतु अत्यधिक खर्चीला, समय, शक्ति तथा ज्ञान की आवश्यकता होती थी । अतः एक दूसरी धारणा का श्रीगणेश हुआ जिसमें उपनिषद् के ऋषियों ने ऐसे तत्त्वों का आविष्कार किया जहाँ सब कर्मों का त्याग हो । केवल जीवन धारण करने योग्य कर्मों को करते हुए अपने अन्दर स्थित आत्मा का चिन्तन करना श्रेयस्कर माना । इससे जीवन के प्रति उदासीनता का भाव आ गया । द्वापर के अंत में तभी भगवान श्रीकृष्ण ने निष्काम कर्मयोग की व्याख्या प्रस्तुत की जिसमें कर्मां के त्याग के बिना ही निःश्रेयस की प्राप्ति हो सकें । इसमें कर्मों के त्याग की जगह कर्मफल से निस्पृह रहने की बात कही गई है । यज्ञ, दान, तप के त्याग की जगह इसे करने की बात कही गई है परंतु स्पृहा रहित होकर करने की आज्ञा दी गई है क्योंकि ये सात्विक कर्म मन को शुद्ध करते हैं (18/5) । इसके साथ ही उन्होंने तप, यज्ञ आदि की परिभाषा को भी विस्तृत करते हुए कहा है कि कोई भी कार्य जो जनकल्याण हेतु होते हैं वे सभी यज्ञ हैं । इसमें स्वाध्याय रूप ज्ञानयज्ञ, भगवद्प्रीत्यर्थंकर्म दैवयज्ञ, इसमें होने वाले कष्ट सहन रूपी तपयज्ञ आदि की विशद व्याख्या चौथे अध्याय में हुई है। ये सभी ज्ञान मार्ग से प्राप्त होने वाले फलों की तरह ही प्रभावी हैं । जनक सदृश ज्ञानी ने कर्म मार्ग द्वारा ही पूर्णता प्राप्त की । भगवान कृष्ण का जीवन तो निष्काम कर्मयोग का साक्षात् विग्रह ही है और उनके कर्म इसकी व्याख्या हैं जिससे हम कर्म कुशलता के द्वारा भगवद्योग को प्राप्त कर ब्रह्मानंद के भागी हो सकते है । श्रीमान् अर्जुन जो जिज्ञासु तो थे परंतु उनका मानसिक गठन ज्ञानयोग तथा भक्तियोग के अनुकूल नही था । अतः भगवान ने उन्हें कर्मयोग में ही प्रतिष्ठित किया । हांलाकि भगवान ने अर्जुन को गीता के अन्य योगों के बारे में भी बताया था परंतु उन्हें कर्मयोगी बनाते हुए कहा-मेरा स्मरण करते हुए युद्ध करो । ‘तस्मात्सर्वेषु कालेषुमामनुस्मर युध्य च।’

योग का समन्वयवादी दृश्टिकोण:
भगवान् ने गीता में अर्जुन को सभी योगों के बारे में बताया है परंतु उन्हें अन्य योगों को छोड़कर कर्मयोग की ओर प्रेरित किया है क्योंकि अर्जुन में कर्मठता कूट-कूट कर भरी थी | यह कर्मठता उनकी प्रकृति के भी अनुकूल थी । हालांकि अन्य गुण भी थे परंतु अन्य गुण यथा, जिज्ञासा, भक्ति आदि की मात्रायें गौण थी फिर भी अर्जुन ने इसका उचित अनुपात में उपयोग किया । भगवान् श्रीकृष्ण ने ‘योग’ शब्द का उपयोग भी कर्मयोग, भक्तियोग, ज्ञानयोग तथा राजयोग के लिये किया है । यथा 2.48, 50 तथा 6.2 में योग को कर्मयोग के लिए, परंतु 6.12, 15 में राजयोग के लिए, 5.8 में युक्त शब्द का उपयोग ज्ञानयोगी के लिए और 8.14 में ‘नित्ययुक्त’ शब्द भक्तियोगी के लिए हुआ है वैसे भी गीता का कर्मयोग तो भक्तिमय ज्ञानयोग है , इसी तरह गीता का भक्तियोग भी कर्ममय ज्ञानयोग तथा ज्ञानयोग भक्तिमय कर्मयोग है अर्थात् गीता का योग समन्वयकारी योग है । परंतु ज्ञानयोगी में ज्ञान की, भक्तियोगी में भक्ति की तथा कर्मयोगी में कर्म की प्रधानता तो रहनी चाहिए परंतु अन्य दो की भी अनुभूति होनी चाहिये ।

अवतारवाद का सिद्धान्त
वेदों में यत्र-तत्र अवतार की बातें हुई हैं । पुराणों में भी दशावतार का वर्णन है । जो गीता में आकर पूर्णता को प्राप्त हुआ है । इसी परिप्रेक्ष्य में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि ये योग मैंने विवस्वान को, मनु को तथा इक्ष्वाकुवंशी राजाओं को दिया था जो कालक्रम में लुप्त हो गया और अब वही योग मैं तुम्हें दे रहा हूँ । अर्जुन ने जब यह जानना चाहा कि ये कैसे हुआ तो उन्होंने जवाब दिया कि हमारे अनेकों जन्म हो चुके हैं । यद्यपि भगवान् अजन्मा हैं फिर भी अपनी मायाशक्ति का आश्रय लेकर निजइच्छा से बार-बार अवतरित होते हैं और धर्म की स्थापना करते हैं । इसी क्रम में भगवान् का दिकदिंगत, सार्वजनिन, सार्वकालिक तथा सर्वव्यापी उद्घोष होता है :

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारतः ।

अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ।।

Happy Birthday-- Mugdha Godse


Monday, July 25, 2016

The Coffee Table book on Jeevan Ashram & Saint R.S.Dhaka released


The Coffee Table book on Jeevan Ashram & Saint R.S.Dhaka ji by our Mg.Editor Sh. S. S. Dogra released by Sh.Hari Pal Rawat Advisor of Sh.Harish Rawat Chief of Uttrakhand along with Ms. Arpita Bansal ji Muskan K.K.Trust & Sultan Movie artists.{Photo: Monica Singh)

Blood Donation Camp held by Sant Nirankari Charitable Foundation

Sant Nirankari Charitable Foundation, a branch of Sant Nirankari Mandal, organised a Blood Donation Camp (BDC) at Nirankari Satsang Bhawan, Sector 19-B, Dwarka, on the 24th July, 2016. No doubt, official time of donation of blood was fixed from 9.00 AM to 2.00 PM, but most of the members of Sewa Dal had taken charge of their duty from 6.00 AM onwards to make various arrangements required for the BDC. Not only that, young boys and girls were also encouraged to render their services one day in advance for making due arrangements and they voluntarily and gladly did their Sewa.

In fact, Ved Batra ji, Mukhi Mahatma of Satsang Bhawan, Dwarka and another senior Mahapursh, Shri SM Bhatia, had given comprehensive details of the Blood Donation Camp four days in advance during Satsang, on last Tuesday and a large number of Mahapurshes and sisters were quite eager to render their services which were assigned to them for making this blood donation camp successful. Dr. Naresh Arora, Organising Secretary of Sant Nirankari Charitable Foundation and Shri Ram Sharan ji, Sector In-charge of Dwarka, also played pivotal roles in making the devotees of Sant Nirankari Mission understand the value and importance of donating blood and also for making various arrangements for this camp.

Dr. Saloni Mahajan, a doctor from Indian Red Cross Society, New Delhi, along with her team of Technicians, Laboratory Attendants and Social Workers – fourteen people in all, visited Nirankari Satsang Bhawan for taking blood.

Many saints desirous of donating blood had gathered in long queues in front of the Satsang Bhawan for getting themselves registered for this Camp. All were seen in jolly good mood and were eager to do this social and humanitarian service. By the grace / blessings and teachings of Her Holiness, Satguru Mata Savinder Hardev ji Maharaj, all the saints realise that as and when some person has to be operated upon for curing his or her disease / some medical emergency, operation / surgery etc., only another human being can save his or her life by donating blood, as there is simply no substitute for blood. And that is why many saints from the entire Dwarka Sector (Unit No. 422 of Delhi) consisting of some other colonies located on the outskirts of Dwarka namely - Kakrola, Goela Diary, Shyam Vihar, Seeta Puri, Uttam Nagar, Palam, Madhu Vihar and Sagar Pur etc., had thronged at the Satsang Bhawan for this noble cause. Young boys and girls, gents and ladies, all were enthusiastic and they had to wait for their turn for donating blood.

Blood donation camp was successfully concluded at around 2.30 PM with 202 people finally donating blood at this Camp, including myself and my son, Vishal Bhardwaj. Light refreshments were also served to the people who donated blood and to the team of doctors / their assistants etc. from Indian Red Cross Society.

Some Rejections : Even though, many more people wanted to donate blood, but on interacting with doctors, it is gathered that around 75 people were rejected for making this donation due to various reasons like – high BP problem, having weight less than 50 Kg, in-take of some medicine 24 hours prior to donation of blood, making of some tattoo in any part of the body within previous six months of this camp, and also having haemoglobin lower than 12.5.

It is also gathered that some senior citizens, even though they were having good health and quite enthusiastic and willing to donate blood, were politely denied this noble opportunity, due to strict government guidelines for this purpose.

After this blood donation camp was concluded, the team of doctors and their assistants were allowed to leave blood donation venue only after having Langar (lunch) served by Nirankari Satsang Bhawan, Dwarka.
Even though there were so many saints who rendered services (Sewa) whole-heartedly during this Blood Donation Camp, but saints like Mohan Kapur, Davinder Aggarwal, Dr. Rashpal Bhatia, Yash Wasudev, Veena Aggarwal, Sunanda Bhardwaj, Rajeshwari, Rajni Wasudev and Mrs. Anju Kapur were prominent amongst the Sewa Dal members.

Citizen Reporter 
R.D. Bhardwaj “Noorpuri”

6th International Conference on Management Practices & Research (ICMPR-2016) held at Apeejay School of Management, Dwarka, New Delhi


Apeejay School of Management, Dwarka, New Delhi organized the 6th International Conference on Management Practices & Research (ICMPR-2016) on 22nd July 2016. The theme of the conference was ‘Global Business Trends and Innovations’. The conference served as an interactive platform for discussion on contemporary issues, and innovations in the constantly evolving global business environment. The conference brought together more than 50 delegates from various national and international institutes who shared their views and experiences through paper presentations and discussions.

In the inaugural session, Prof. Alok Saklani, Director, Apeejay School of Management welcomed the guests and wished all the participants a great learning experience in the conference. He also shared some of recent incidents and developments which would have impact on global business. Conference Perspectives were shared by Prof. Ashok Ogra, Director, Apeejay Institute of Mass Communication. He dwelt on MNCs and Global brands. He spoke of Michael Porters reference to globalization as three phases of business. In the inaugural conference address, Dr. M.M. Pant, former Pro-Vice-Chancellor, IGNOU and a reputed management and technology expert highlighted the various nuances of advent of technology in various aspects of human life as well as business organisations. This would result in drastic changes in the way of life in coming years. Dr. Rashmi Malhotra, Professor of Decision and System Sciences at Saint Joseph’s University, Philadelphia, USA delivered the keynote address. She presented her views on the power of business intelligence and Big Data. She emphasized the importance of Big Data and discussed the trends in Big Data analytics. 

A conference preceding containing research papers presented in the conference, bearing an International Standard Book Number (ISBN) was also released on the occasion. In the end, Dr. Monika Arora, the Convenor of the conference presented a vote of thanks.

The inaugural session was followed by parallel technical sessions with multiple tracks on Human Resource Management, Marketing, Finance, International Business, General Management, Information Technology and Operations Management wherein academicians, researchers and practicing managers and other scholars presented their research findings and perspectives for the future vis-à-vis specific domains of knowledge and practice. The Conference provided a platform to exchange and share experiences, new ideas, and research on various aspects of Management, as well as, the problems encountered and emerging solutions. The deliberations during the conference would certainly stimulate academia engaged in business studies to delve deeper into the serious issues, faced by business, today.

FINNISH STAINLESS STEEL MAJOR OUTOKUMPU BESTOWED WITH BEST INNOVATIVE RAW MATERIAL SUPPLIER AWARD AT VIBRANT INDIA

Finland based Outokumpu, leading stainless steel manufacturer has been bestowed with best innovative new age raw material supplier award instituted by Vibrant India an organisation linked with houseware and home appliances .

Outokumpu is well known for its new age high quality offering in surface finishes and grades including R2R and high chromium ferritic stainless steel grade 1.4622 stainless steel with improved corrosion resistance, strength, and formability. Both products are best suited for emerging food and drink industry, home ware, catering and industry.

“Stainless steel is now the preferred material for home ware , catering, home appliances, modern building and architecture due to its high mechanical strength, resistance to corrosion, aesthetics and cost efficiency. It performs well in extreme climate conditions and needs little maintenance.” Said Mr Yatinder Pal Singh Suri, Managing Director and Country head, Outokumpu India.

“The widespread use of stainless steel in the food and drink, catering and kitchenware industry reflects the fact that stainless steel resists corrosion by most food and beverages. The product is not contaminated by stainless steel, and consequently no flavours or discolouration is imparted to the food and drink. In addition, stainless steel is readily cleaned, providing hygiene in food processing and handling. Stainless steel is also strong and can be formed into necessary shapes for food processing, handling and storage. Stainless steel is the ideal material to use in the food & drink industry” said Mr Suri.

“As a versatile, long-lasting and 100 per cent recyclable material, stainless steel offers great opportunities for a number of industries to create a more sustainable future.Outokumpu has been lauded, recognised and rewarded by the end user industry, and associations and business platforms for bringing the most modern and innovative stainless steel products and applications to India. Our innovative products have made Indian end users competitive in the global markets and even the domestic industry has gained knowledge from the products and applications which India is not capable to offer currently.

We are the global benchmark in sustainability on the Dow Jones sustainability index. Even our competitors respect us. International Stainless Steel Forum (a body of global stainless steel producers) did so by giving the first sustainability award to Outokumpu.

Our in-house research and development on products and processes has led to development of many new grades. Being the oldest and emerging leader in stainless steel, we have so much to offer to India. The nation needs us and we are ready to do our best to build Stainless India.

Thanks for your VISITs

 
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