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Thursday, January 19, 2017

सुलतान का एलान... दबंग 3 ईद पर होगी रीलिज

-प्रेमबाबू शर्मा

सलमान खान की दबंग 3 को लेकर अगर कोई सबसे बड़ी चर्चा है तो वो है फिल्म की हीरोइन। फिल्म इसी मास जनवरी से फ्लोर पर जा रही है और सलमान खान की हीरोइन की तलाश जारी है। सलमान खान की दबंग 3 को लेकर आखिरी एलान हो चुका है और चुलबुल पांडे एक बार फिर से ईद पर दस्तक देंगे। अरबाज खान तेजी से फिल्म की कहानी लिख रहे हैं और फिल्म इसी माह यानि जनवरी से फ्लोर पर चली जाएगी।

जबकि सलमान एक अन्य फिल्म खान दनादन शूट भी करने वाले हैं। क्योंकि यह फिल्म भी ईद पर फिल्म को रिलीज होगी, और क्रिस्मस 2017 तक सलमान टाईगर जिंदा है में व्यस्त रहने वाले हैं।

सलमान खान ईद पर ट्यूबलाइट और फिर दिसंबर में टाइगर जिंदा है के साथ परदे पर नजर आएंगे। फिलहाल तो सलमान खान ने कोई और प्रोजेक्ट के बारे में खुलकर बात नहीं की है। हालांकि सलमान का इसके अलावा कई फिल्में, प्रोड्यूस करने का प्लान है, जिनमें से एक में सुशांत सिंह राजपूत और जैकलीन फर्नांडीज फाइनल हैं। वहीं दबंग 3 के लिए हीरोइन की तलाश तेजी से जारी है।

जानिए फिल्म से जुड़ी कुछ दिलचस्प बातें -
हीरोइनों का सेलेक्शन
दबंग 3 की कास्टिंग अभी भी फैन्स के लिए सरप्राइज ही बनी हुई है। लेकिन चर्चा है कि ईद का रोमांस सलमान शाहरूख खान की स्टार वाइफ यानि फैन की एक्ट्रेस वलूशा डीसूजा के साथ करने वाले हैं। हालांकि एमी जैक्सन का नाम भी फिल्म से जुड़ रहा है।

सुलतान का एलान...जनवरी 2018 से दबंग 3 और सलमान
सलमान खान की दबंग 3 को लेकर अगर कोई सबसे बड़ी चर्चा है तो वो है फिल्म की हीरोइन। फिल्म जनवरी 2018 से फ्लोर पर जा रही है और सलमान खान की हीरोइन की तलाश जारी है।

सलमान खान की दबंग 3 को लेकर आखिरी एलान हो चुका है और चुलबुल पांडे एक बार फिर से ईद 2018 पर दस्तक देंगे। अरबाज खान तेजी से फिल्म की कहानी लिख रहे हैं और फिल्म जनवरी 2018 से फ्लोर पर चली जाएगी। यानि कि सलमान खान दनादन शूट करने वाले हैं। क्योंकि ईद पर फिल्म को रिलीज होना है। और क्रिस्मस 2017 तक सलमान टाईगर जिंदा है में व्यस्त रहने वाले हैं।

इसके पहले 2017 में सलमान खान ईद पर ट्यूबलाइट और फिर दिसंबर में टाइगर जिंदा है के साथ परदे पर नजर आएंगे। फिलहाल तो सलमान खान ने कोई और प्रोजेक्ट के बारे में खुलकर बात नहीं की है।
सलमान खान की ट्यूबलाइट ने तो फ्यूज ही उड़ा दिया!,

हालांकि इसके अलावा उनकी कई फिल्में, प्रोड्यूस करने का प्लान है, जिनमें से एक में सुशांत सिंह राजपूत और जैकलीन फर्नांडीज फाइनल हैं। वहीं दबंग 3 के लिए हीरोइन की तलाश तेजी से जारी है। सलमान इन 10 नई हीरोइनें के काम पर पूरी नजर रख रहे हैं।

दबंग 3 की कास्टिंग अभी भी फैन्स के लिए सरप्राइज ही बनी हुई है। लेकिन गपशप गली की मानें 2018 में ईद का रोमांस सलमान शाहरूख खान की स्टार वाइफ यानि फैन की एक्ट्रेस वलूशा डीसूजा के साथ करने वाले हैं। हालांकि एमी जैक्सन का नाम भी फिल्म से जुड़ रहा है।

दबंग माइनस 1
दबंग 3, दबंग का सीक्वल ना होकर प्रीक्वल है। यानि कि दबंग के पहले कि कहानी। सीधे शब्दों में चुलबुल पांडे, रॉबिनहुड पांडे कैसे बने इसकी कहानी। इस कहानी को अरबाज ने सलमान के कहने पर 2 बार बदला है।

दबंग 3 की पहली खबर
अगर सूत्रों की मानें तो फिल्म में सलमान खान ने साजिद वाजिद की जगह हिमेश रेशमिया को मौका देने की ठान ली है। गौरतलब है कि साजिद वाजिद दबंग सीरीज की पहचान हैं। तोरे नैना से लेकर मुन्नी तक उन्होंने दबंग का हर गाना पॉपुलर किया है। हालांकि ऐसा ही साथ सलमान और हिमेश का था। हेलो ब्रदर के जमाने से सलमान हिमेश साथ काम कर रहे थे। और अब दबंग 3 में भी हिमेश का म्यूजिक होगा।

नो मुन्नी, नो आईटम
अब अरबाज और मलाइका के बीच चीजें हाल ही में कैसी रही हैं, सब जानते हैं। ऐसे में फिल्म में मलाईका का आईटम नंबर होगा, इस पर काफी संदेह है। हालांकि मलाईका का आईटम, दबंग की जान हमेशा रहा है। ऐसे में दबंग 3 में क्या बदलेगा इसका सबको इंतजार है।

पिछले आईटम से कंट्रोवर्सी
शबाना आजमी ने खुलकर दबंग 2 के आइटम सॉन्ग - फेविकोल से पर प्रहार किया था। शबाना ने कहा कि ऐसे गाने औरत को एक चीज बनाने के पेश करते हैं। गाने में एक जगह करीना कपूर कहती हैं कि मैं तंदूरी मुर्गी हूं और मुझे शराब से गटक जाओ। और यही गाने 6 साल का बच्चा गाता है और ये गलत है। पढ़िए पूरी बात--झख्अगर करीना तंदूरी मुर्गी है तो केवल सलमान ही चखेंगे?,

परिणीति की एंट्री
माना जा रहा था कि अरबाज खान को परिणीति चोपड़ा, फिल्म की लीड के लिए परफेक्ट लग रही हैं और वो जल्द परी को अप्रोच कर सकते हैं। इससे पहले, जब परिणीति के हाथ से सुलतान गई थी तो ये साफ हो गया था कि सलमान उनके साथ काम नहीं करना चाह रहे हैं।

रज्जो नहीं तो सोना नहीं
कहा गया कि सलमान खान और सोनाक्षी सिन्हा के बीच चीजें तब से नहीं ठीक चल रही थीं, जब से सोनाक्षी ने अरबाज खान की फिल्म डॉली की डोली रिजेक्ट कर दी थी। लेकिन सोनाक्षी ने साफ कहा कि अगर दबंग 3 में रज्जो है तो वो रोल मेरा ही रहेगा।

कंफर्म हो गई हीरोइन
अरबाज खान कुछ महीनों पहले ही कंफर्म कर दिया है कि सोनाक्षी सिन्हा दबंग 3 का हिस्सा होंगी और फिल्म 2018 में शुरू की जाएगी। हालांकि अरबाज ने ये भी साफ कर दिया कि फिल्म में एक और हीरोइन होगी और सोनाक्षी का रोल कितना होगा, ये स्क्रिप्ट पर निर्भर करता है। दबंग 3, दबंग का सीक्वल ना होकर प्रीक्वल है। यानि कि दबंग के पहले कि कहानी। सीधे शब्दों में चुलबुल पांडे, रॉबिनहुड पांडे कैसे बने इसकी कहानी। इस कहानी को अरबाज ने सलमान के कहने पर 2 बार बदला है।

काजोल ने किया रिजेक्ट
चर्चा थी कि अरबाज खान ने दबंग 3 में एक रोल के लिए काजोल को अप्रोच किया था और ये रोल था निगेटिव लीड का। काजोल को रोल में दम नहीं लगा और उन्होंने साफ कहा कि सलमान खान के आगे ये रोल फीका लग रहा है और इसलिए उन्होंने फिल्म को कर दिया ना।

नई हीरोइन की टॉपलेस तस्वीरें
सलमान की एक करीबी दोस्त पर्ल राह को लेकर ये अफवाहें उड़ रही हैं कि वो दंबग 3 में उनका भी रोल है। वहीं उनके नाम की हवा तब बनी जब उन्होंने अपनी कुछ टॉपलेस तस्वीरें पोस्ट की। कुछ ही देर में ये तस्वीरें वायरल भी हो गईं। खबरों ने जोर तब पकड़ा जब पर्ल की तरफ से खबरें आईं कि सलमान ने उन्हें डिनर पार्टी में इन्वाइट किया हालांकि सूत्रों की मानें तो उन्हें दबंग 3 के लिए मौका मिल सकता है।

Wednesday, January 18, 2017

समाज के एक बड़े मुद्दे को ध्यान खींचती है,‘हरामखोर’

-प्रेमबाबू शर्मा

फिल्म ‘हरामखोर’ समाज के एक बड़े मुद्दे को ध्यान खींचती है, जो सराहनीय है। लेकिन अफसोस की बात है कि इस ओर सामाजिक जागरुकता या अस्वीकार्यता के बीच विवादित सीन डार्क ह्यूमर या दुस्साहस का अवतार नहीं धर पाते। फिल्म में कई बातें अनकही रह जाती हैं, जिनका जवाब नहीं मिलता।एक डायरेक्टर दर्शकों के लिए कुछ सवाल छोड़ जाए, लेकिन श्लोक शर्मा अपने दर्शकों से कुछ ज्यादा ही अपेक्षा कर बैठे हैं।
फिल्म की खामियों की बात करें तो इसका प्रचार.यह कहकर किया गया कि यह फिल्म बाल शोषण पर है। लेकिन फिल्म देखकर लगता है कि फिल्म में बाल शोषण तो हैं लेकिन स्वेच्छा से है और फिल्ममेकर ने उसे मुद्दा बनाकर प्रचार का हथियार बनाया है। फिल्म में मुख्य भूमिका निभायी है नवाजुद्दीन सिद्दकी और श्वेता त्रिपाठी जिसे निर्देशित किया है श्लोक शर्मा ने ।

फिल्म की खामियों की बात करें तो मुझे इसकी सबसे बड़ी कमी लगती है इसका प्रचार. दरअसल इस फिल्म का प्रचार यह कहकर किया गया कि यह फिल्म बाल शोषण पर है। लेकिन फिल्म देखकर लगता है कि फिल्म में बाल शोषण तो हैं लेकिन स्वेच्छा से है और फिल्ममेकर ने उसे मुद्दा बनाकर प्रचार का हथियार बनाया
ग्रामीण पृष्ठभूमि पर आधारित हरामखोर, की कहानी लव ट्राएंगल है। एक स्कूल टीचर है श्याम (नवाजुद्दीन सिद्दीकी), उसे 14 साल की अपनी स्टूडेंट संध्या (श्वेता त्रिपाठी) से प्यार हो जाता है। इस प्रेम कहानी का तीसरा एंगल है कमल (इरफान खान), जो संध्या के साथ ही ट्यूशन पढ़ता है। कमल जो संध्या से प्यार करता है और उसका एक शैतान-चंचल दोस्त मिंटू। दोनों जिगरी दोस्त हैं। मिंटू कमल को संध्या को रिझाने के लिए अजीब-अजीब तरीके बताता रहता है। इसी क्रम में दोनों बालकों को अंदेशा होता है कि श्याम और संध्या के बीच कोई खिचड़ी पक रही है।

जिन लोगों ने ‘हरामखोर’ फिल्म फेस्टिवल्स में देखी है, वह बताते हैं कि कई सीन काटे गए हैं। लेकिन जो भी कारण रहा हो, स्क्रीनप्ले में बहुत कुछ छूटा सा जान पड़ता है। बहरहाल, इस बोल्ड लेकिन अनसुलझी सी फिल्म में जो बात सबसे अधिक अपील करती है वो है कास्टिंग। मुकेश छाबरा ने कास्टिंग के स्तर पर जबरदस्त काम किया है। खासकर श्वेता त्रिपाठी के मामले में जो 31 साल की होकर 14 साल की लड़की का रोल प्ले कर रही हैं।

श्वेता त्रिपाठी फिल्म ‘मसान’ में अपनी प्रतिभा का लोहा पहले ही मनवा चुकी हैं और एक बार फिर ‘हरामखोर’ के सहारे उन्होंने साबित कर दिया कि वो एक मंझी हुई कलाकार हैं।नवाज एक अच्छे अभिनेता हैं और यहां भी उनका अभिनय काफी दमदार है। इस फिल्म की जान हैं फिल्म की दो बच्चे यानी मास्टर इरफान और मास्टर मोहम्मद समद, जो फिल्म को मनोरंजक बनाए रखते हैं। अभिनय तो उनका अच्छा है।

संध्या को उसकी मां घर से निकाल देती है और रुखे व्यवहार वाले पिता से ऐसे ही कोई साथ नहीं मिलता। अब टीचर श्याम संध्या को शरण देता है। संध्या श्याम के साथ सेक्सुअल रिलेशन में आती है। उसके गुस्से को भुगतती और समझने की कोशिश करती है। निर्णयों को बदलती है। जबकि श्याम मौकापरस्त है। नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने एक बार फिर साबित किया है कि वो बेहतरीन एक्टर हैं। आज के दौर के सबसे जबरदस्त एक्टर्स की फेहरिस्त में वो टॉप ऑर्डर में हैं। गुस्सा, भावुकता, हंसी जैसे सारे भावों को एक साथ हर बदलते फ्रेम में कैसे सजाया जा सकता है, यह नवाज को बखूबी आता है।

Join the cause #IWILLGOOUT


हिंदी भाषा और साहित्य में भारत की आत्मा के दर्शन


-अशोक लव

“हिंदी भाषा में प्रचुर और विविधतापूर्ण साहित्य की भरमार है. इसमें भारत की आत्मा के दर्शन किए जा सकते हैं. ग्रामीण परिवेश में किसानों की दशा हो या नगरीय संस्कृति हो, हिंदी साहित्य में उत्कृष्ट लेखन हो रहा है. आज लोकार्पित पुस्तकों में ही ले लें, इनकी कविताएँ, लघुकथाएँ और आत्मकथात्मक -जीवनी सभी श्रेष्ठता लिए हैं. हिंदी की अंतर्राष्ट्रीय पहचान है. विश्व पुस्तक मेले में हिंदी की हज़ारों पुस्तकें प्रदर्शित हो रही हैं और बिक रही हैं. यह सुखद स्थिति है.”- नेशनल बुक ट्रस्ट के ‘साहित्य संवाद’ कार्यक्रम में ‘इंद्रप्रस्थ लिटरेचर फेस्टिवल’ और ‘अंतर्राष्ट्रीय किसान परिषद’ द्वारा आयोजित परिचर्चा की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार अशोक लव ने संबोधित करते हुए कहा. 

साहित्य, समाज, किसान और मीडिया विषयों पर आयोजित कार्यक्रम की मुख्य-अतिथि सुशीला मोहनका इस कार्यक्रम में भाग लेने के लिए अमेरिका से विशेष रूप से आईं थीं. परिचर्चा का आरंभ करते हुए उन्होंने कहा कि मैं अमेरिका में ‘ अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति’ के द्वारा हिंदी भाषा और संस्कृति के प्रचार-प्रसार में तीस वर्षों से कार्य कर रही हों. हमें भारत में भी हिंदी के प्रति उचित धारणा बनानी चाहिए. अपनी संस्कृति को सुरक्षित रखने के लिए बच्चों और युवाओं को सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेने के लिए उत्साहित करना चाहिए. 

वरिष्ठ पत्रकार और ‘द्वारका परिचय’ के प्रबंध संपादक एस.एस. डोगरा ने विशिष्ट-अतिथि के रूप में मीडिया की भूमिका पर विचार प्रकट करते हुए कहा कि आज मीडिया समाज के सभी क्षेत्रों के लिए सशक्त माध्यम बन चुका है. मीडिया सामाजिक सोच को प्रभावित करता है. प्रिंट मीडिया हो या इलैक्ट्रोनिक दोनों की अहम भूमिका है. इस स्थिति में मीडियाकर्मियों की जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है. उन्होंने इस प्रकार की महत्त्वपूर्ण गोष्ठी आयोजित करने के लिए अशोक लव तथा चंद्रमणि ब्रह्मदत्त का धन्यवाद किया. उन्होंने हिंदी पत्रकारिता की वर्तमान स्थिति पर भी अपने विचार रखे. 

विशिष्ट-अतिथि मनीष आजाद ‘रेडियोवाला’ जो एफ.एम. चैनल के उदघोषक हैं, उन्होंने मीडिया के रूप में रेडियो की भूमिका और हिंदी भाषा के महत्त्व पर बोलते हुए कहा कि उन्हें गर्व है कि व्यवसायिक रूप में वे हिंदी भाषा के साथ सीधे जुड़े हुए हैं. हिंदी हमारे मन की भाषा है. विशिष्ट-अतिथि अरविंद पथिक ने किसानों और साहित्य के संबंधों पर बोलते हुए कहा कि हिंदी साहित्य में ग्रामीण परिवेश पर हज़ारों रचनाएँ लिखी गई हैं. किसानों की दशा-दुर्दशा पर आज भी खूब लेखन हो रहा है. इससे सामाजिक सोच बदली है. 

इस अवसर पर वरिष्ठ साहित्यकार अशोक लव और अतिथियों ने ‘सुखद सुनहरी धूप’ (काव्य-संग्रह,अनिल उपाध्याय), आशा की किरणें (लघुकथा-संग्रह,सत्यप्रकाश भारद्वाज), लालसा(काव्य-संग्रह, वीरेंद्र कुमार मंसोत्रा), शब्दों की उड़ान(काव्य-संग्रह,मुकेश निरूला), मेरी कहानी मेरी जुबानी (संपादक-सत्यप्रकाश भारद्वाज) पुस्तकों का लोकार्पण किया. शीघ्र प्रकाशित होने वाले ग्यारह कवियों के संग्रह ‘हथेलियों पर उतरा सूर्य’ (संपादक-अशोक लव,सत्यप्रकाश भारद्वाज)के कवर और अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति अमेरिका की पत्रिका ‘विश्वा’ का भी लोकार्पण किया गया. समारोह का कुशल संचालन युवा कवि आशीष श्रीवास्तव ने किया. दोनों संस्थाओं की और से उन्होंने अध्यक्ष, मुख्य-अतिथि, विशिष्ट-अतिथियों और श्रोताओं का धन्यवाद किया.

कोई कारन तो होगा बन्दे !

आर. डी. भारद्वाज "नूरपुरी"

इक झोली में फ़ूल भरें हैं इक झोली में काँटे रे,
तेरे बस में कुछ भी नहीं, ये तो बाँटने वाला ही बाँटे रे,
कोई कारन होगा बन्दे , कोई कारन होगा !!

पहले बनती है तकदीरें फिर बनतें हैं शरीर,
ये तो दाता की है कारीगरी, तू क्यों बैठा गम्भीर,
साँप भी डस ले तो मिल जाए किसी को जीवन-दान,
चींटी से भी मिट सकता है, किसी का नामोनिशान,
कोई कारन तो होगा बन्दे , कोई कारन होगा !!

धन से बिस्तर तो मिल जाए, पर नीन्द को तरसें नैन,
नन्गे फर्श पर भी सोकर भी आए किसी के मन को मिल जाये चैन,
सागर से भी बुझ सकती नहीं कभी किसी की प्यास,
और कभी एक ही बूँद से मिट जाती है तड़़पते मन की प्यास ,
कोई कारन तो होगा बन्दे , कोई कारन होगा !

छोड़दे दुनियादारी के झमेले, निरंकार पे रख विश्वास ,
कर्म कर अपने अच्छे , सब को प्रेम प्यार से मिल ,
खुश होकर दाता तेरी फटी तकदीरें भी देगा सिल ,
पत्थर में बैठे कीढ़े को भी यह देता है खाना और स्वास,
कोई कारन तो होगा बन्दे , कोई कारण होगा !

यह भी कोई जरुरी नहीं कि निरंकार के सारे खेल समझ में आ जाएँ,
यह भी जरुरी नहीं कि तेरे सभी उलझे हुए तंद सुलझ जाएँ ,
जरुरी तो है भारद्वाज ! जो बात बन जाए, उसके लिए कर दाता का शुकराना ,
फिर किसने रोका है, एक रहमत मिल जाने पर दूसरी अर्जी नहीं लगाना ?
सत्गुर माता जी मुरादें पूरी करती हैं सबकी, कब कहाँ और कैसे, यह सवाल नहीं उठाना,
क्योंकि, प्यारी साध-संगत जी ! उनकी ओर से विलम्भ होने का भी,
कोई कारन तो होगा बन्दे, कोई कारण होगा !

Tibetan spirtual leader HH Dalai Lama to address country's business women on January 21


Educating the future society…………



Rashmi Malik
Principal
Delhi International School
Sector-23, Dwarka, Delhi

Life is an unending learning journey, since our birth to the end (may be beyond) we keep learning. From the ancient times to the modern era people have been trying to find “Systems” of right education to create better society. Being in education for almost 20 years now ,I am often asked about my take on today’s education system by parents, students and the people who are associated with the education world. Over so many years meeting so many people , educating thousands of students and doing a balancing act between the Indian and International trends I have found out that everything comes down to a simple formula which is to keep your roots firmly grounded in Ancient Indian system and extend the branches in the world. 

I am sharing the base line of my thoughts on education system here today (Influenced by many reformers and my own experience) :

“The Education system is a dynamic field (Yes it cannot be static version used for years) as it deals with different individuals every moment. Every moment in class rooms new things are happening depending upon the situation and the energy of the students available.

In broader form there are 5 dimensions of education for a learner especially in schools:

The First dimension is Informative and Languages. Informative areas like geography, History etc which can be taught positively by focussing on the inspirational episodes from History and making kids aquainted to geography so as to make them comfortable about all the parts of earth. The language is necessary for communication, the child must learn the pure form of mother tongue as well as an international language like English to sail through this world.

The Second dimension is of inquiry of scientific subjects, which is tremendously important for analytical skills.

The Third dimension is art of living which includes sense of humour , laughter and sensitivity to the nature around. Imagine the world without laughter and love, how sad and grim it would be. So the child must be attuned to nature and helped to learn how to transform hate, anger and jealousy into love. Then only all other material achievement will make sense else all the efforts will go waste.

The Fourth dimension is of art and creativity. Painting , Music, Craftsmanship, pottery etc. Immersing in which the child learns to improve concentration, self esteem, happiness and release of negativity.

The Fifth dimension surprising for all is about life and death, through the examples of daily life, the nature ,the people , everything around which is having a cycle of birth and death. This knowledge keeps the child rooted forever."

If all of the above dimensions are basis for whatever “system” we create in our institution we can think of the holistic development of our kids.

At DIS these five dimensions are being taken care by various methods and International ways. Till date the achievements have been tremendous but as I said earlier education is dynamic hence the methodology keeps improving from time to time and person to person.

Happy educating !!

Active Listening


-Commander VK Jaitly

We all know that Communication takes place only if there is a speaker and also there is a listener. Further, Communication is necessarily a Two-Way process that means communication is considered complete only when the listener or the receiver acknowledges that he/she has received the message, may be with just nodding of the head.

We also know that God has given us two ears to listen and one mouth to speak. That means that in our day today conversations we should be listening more and talking less. When we listen, we learn while when we speak, we only say what we know and therefore there is no value addition to our knowledge bank. So listening is a beneficial exercise for us while speaking is an energy consuming exercise.
So listening is one of the most important skills that we should try to improve upon. How well we listen has a major impact on our performance and effectiveness in our job. Good listening skills lead to good relationships with the people with whom we interact. Remember, all great leaders are great listeners.

While I am writing this article, I can listen to the conversation that is going on between my wife and my daughter as my wife is on speaker phone. But I am not paying any attention to that. My concentration is fully on writing this article. So I am not aware about the exact contents of their conversation though I know they are talking about my next offsite/outbound program at Ranthambore next month for a company where my daughter is expected to accompany me.

Yesterday, when I visited the corporate office of the same company and had a meeting for almost half an hour with their CEO, I listened to him with full concentration. I was trying to fully understand the issues their company is facing and their CEO wanted me to address those issues during the training sessions at the resort. I had reminded myself before the meeting itself and in fact constantly during the meeting too that my goal was to truly hear what the CEO was saying. In fact, I had set aside all other thoughts and was only concentrated on the message and I was also jotting some of the important points in my diary. My mobile phone was not in silent mode but switched off as it gives some sort of vibration even in silent mode and that does distract the attention. In between, I was asking some questions, reflecting on what the CEO was trying to convey, and I even paraphrased in my own words to ensure that I fully comprehended the message. This is what we call: Active Listening.

For the first 20 minutes, it was the CEO who did 95% of the talking. I was only asking some probing questions to clear my doubts. Then the CEO wanted me to explain him about the proposed venue, mode of transport and my past experience of conducting such offsites. But my active listening for initial 20 minutes had set the stage. Now the CEO was fully in receptive mode and ready to receive whatever I wanted to communicate. In essence, it was a great session of two way communication. I must appreciate that the CEO of the company was also a great listener when I was giving him briefing about the offsite. He too asked me some very pertinent questions about the logistic arrangements at the resort and during our travel to the resort from Delhi.

So it was a session of active listening from both sides. Remember, listening is a skill that we can all benefit from. By becoming a better listener, we can improve our productivity, as well as our ability to influence, persuade and even negotiate. Through active listening, we can avoid conflict, misunderstandings and even earn the respect and unflinching support of our juniors.

In active listening we make a conscious effort to hear not only the words but try to genuinely understand the total message from other person. That includes even looking into the eyes of the other person but not staring at all. We also watch his/her body movement. We cannot allow ourselves to be distracted by a cursory glance on WhatsApp message or by receiving a phone call in between. In fact, if the TV or some back ground music is on, switch it off and close the door to avoid any intrusion. We can’t afford to lose focus on what the other person is saying while engaged in active listening. And most important is that we should listen with an open mind.

Suppose a highly aggrieved and agitated employee of yours comes to you with a bundle of complaints, here active listening can do wonders. Just give a patient hearing nay active listening to the other person. He/She should know that you are listening with full attention to what he or she is saying. Intermittent acknowledgement can be something as simple as just the nodding of your head or a simple “Oh, yes or huh.” You got to give the impression that you have understood his/her problem by paraphrasing what has been conveyed to you. It is not important whether you agree with the other person or not. This process of active listening alone will calm him/her down and he/she will be happy that you have taken all the pains to listen to the problem fully. In fact, you should encourage the speaker to continue speaking, so that you get the complete information that will enable you to take corrective action. This process of active listening alone will solve 50% of the gravity of the problem.
You don’t have to give your verdict immediately. However, if the solution to the problem lies within your powers and you are 100% convinced about the viability of the corrective action that will solve the problem, just do it. But if you feel that the issue needs to be discussed with a few more colleagues or seniors, just tell the person that his/her problem has been fully understood and action will be taken at the earliest with full diligence.

You must have seen a video going viral on the social media of a Border Security Force (BSF) soldier Tej Bahadur Yadav complaining about the food being served. This video has created an uproar in the highest circles of military, para military forces and even at the MOD and MHA levels. This is not the case of bad food but a case of failure of communication between the soldier and his immediate superiors. Had there been a session of active listening by the senior officers of the soldier, he would have continued to be a satisfied and disciplined soldier with the assurance that his grievances will be looked into. People retaliate only when they feel that nobody is listening to them.

Happy Birthday Akshansh


Tuesday, January 17, 2017

स्वर्गीय श्री धर्मवीर जी जैन - प्रधान एवम संस्थापक रत्नत्रय दिगम्बर जैन मंदिर द्वारका

--- एक झलक एवम व्यक्तित्व

स्वर्गीय श्री धर्मवीर जी जैन का आकस्मिक निधन समाज और परिवार के लिए एक न भूलने वाला सत्य है । मृदु भाषी , सहन शील और धार्मिक विचारों से ओत प्रोत स्वर्गीय श्री धर्मवीर जी विलक्षण प्रतिभा के धनी थे। श्री धर्मवीर जी ने अपना जीवन एक अध्यापक के रूप में प्रारंभ किया । सामाजिक और पारिवारिक उत्तरदायित्यों के प्रति वे हमेशा सजग रहे I उनके संस्कार उनके परिवार में विशेषतः पुत्र और पुत्र वधुओं में कूट कूट कर भरे हुए हैं । सादगी और संयम उनके जीवन का एक मात्र उदेश्य था । अपने जीवन काल में वे अपने उत्तर दायित्यों के प्रति पूरी तरह सजग रहे । अपने जीवन के अंतिम वर्ष सादगी, समर्पण और धार्मिक अनुष्ठानों के प्रति समर्पित करते हुए दिनांक 15 जनवरी 2017 को प्रातः 6 30. पर अपने जीवन की अंतिम साँस ली और अपने पुत्र , पुत्रियों ,बहुओं एवं पौत्र -पौत्रियों को छोड़ कर इस संसार के विदा हो हो गए । शास्त्रों में कहा गया है -

"आप अकेला अवतरे, मरे अकेला होए, यूं कबहू इस जीव का साथी सगा न कोय”

अपने जीवन काल में धर्म के प्रति उनकी अपार श्रधा रही । अध्यापक के रूप में कार्य- रत होते हुए अपने जीवन काल में उन्होंने अनेक उतार चदाव देखे लेकिन सत्य के मार्ग से कभी भी विचलित होना नहीं सीखा। उनके विचारों में हमेशा ध्रढता झलकती थी । उनका व्यक्तित्व तथा स्वरुप जैन समाज के लिए एक उदाहरण है ।

मृत्यु जीवन का अनिवार्य और स्वभाविक सत्य है इस वास्तविकता को हमें अपने मन में स्थापित कर लेना चाहिए महाभारत काल में यक्ष ने युधिस्ठर से अपने प्रश्नों में एक बात यह पूछी थी क़ि संसार में सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है युधिस्ठर का अविस्मरणीय उत्तर था क़ि सबसे बड़ा आश्चर्य यह है क़ि हम प्रतिदिन देख रहे हैं कि लोग निश्चित रूप से मृत्यु को प्राप्त हो रहे हैं फिर भी ऐसा व्यहार कर रहे है क़ि जाने बाले तो चले गए पर हम नहीं जायेगे

भ्रम की इस स्थिति से बाहर आकर हमें मृत्यु के सत्य के प्रति आश्वत होना है। मृत्यु परमात्मा का उतना ही मंगलकारी वरदान है जितना जन्म ये सोच हमें पाप कर्मो से बचने की चेतावनी देता है मृत्यु का अहसास हमें अपने कर्तव्यों और दायित्यों के प्रति सजग करता है

जीवन और मृत्यु संसार के ऐसे दो पढ़ले हैं जिनकी कि बाग डोर केवल ईश्वर के हाथों में है । ये ऐसा चक्र है जिससे न तो आज तक कोई बच सका है और न ही बचेगा । पंडित भूदर दास जी द्वारा कृत बारह भावना की वो पंक्तियाँ --

राजा राणा छत्रपति , हाथिन के असवार , मरना सब को एक दिन अपनी अपनी बार,- हमारे इस नश्वर जीवन का यथार्थ रूप प्रस्तुत करती हैं ।

स्वर्गीय श्री धर्मवीर जी जैन का जीवन भी इसी चक्र का एक हिस्सा रहा। अत्यन्त ही धार्मिक विचार सादगी और संयम उनके जीवन का एक मात्र उद्देश्य था

धर्म और वीर --इन दो शव्दो से निर्मित -स्वर्गीय श्री धर्मवीर जी जैन समुदाय द्वारका के लिए प्रेरणा श्रोत रहे सरकारी सेवा से निवर्त होने के पश्चात् उनका सम्पूर्ण जीवन जैन धर्म के प्रति समर्पित रहा जिसका एक मात्र जीता जागता उदाहरण रत्नत्रय दिंगम्बर जैन मंदिर द्वारका हम सभी के सामने है आने वाली पीढ़ियां में रत्नत्रय दिगम्बर जैन मंदिर द्वारका के नाम के साथ साथ उनके नाम को भी हमेशा श्रद्धा और सम्मान के साथ याद किया जायेगा

इस शोक की घडी में संतप्त परिवार के लिए परम पूज्य ऐलाचार्य मुनिराज श्री प्रज्ञ सागर जी ने इस दुःख में मंगल कामना करते हुए केवल यही कहा है कि आयु के समाप्त होने से मृत्यु होती है । जो जन्मा है उसकी मृत्यु भी निश्चित है और जो मरता है उसका पुनः जन्म भी निश्चित है । कर्मवद्ध जीव चाहे जितना भी प्रयत्न करले परन्तु मृत्यु से बच नहीं सकता । मृत्यु का आगमन निश्चित है मुनि श्री ने परिवार की मंगल कामना करते हुए धर्म वृद्धि का आशीर्वाद दिया है उन्होंने कहा है कि जैन शास्त्रों के अनुसार मृत्यु महानिद्रा है , मरण मंगल धर्म का स्वरूप है नव जीवन दायिनी है और वह दुःख मुक्त करने वाली है । जीवन को गुणों से समृद्ध बनाने के लिए मरण का स्मरण आवश्यक है। मृत्यु की स्मृति के बिना जीवन में प्रगति , साधना, एवं रत्नत्रय की उपासना में अप्रमत्ता नहीं आ सकती । ईश्वर परिवार का कल्याण करे |

यह सत्य है के जीवन और मृत्यु प्रत्येक सांसारिक प्राणी के साथ लगे हुए हैं । जो प्राणी धर्माचरण करता , सत्कर्म में संलग्न है, सुवर्ती है और प्रत्येक कार्य में संयम और दया रखता है वह मृत्यु के क्षणों में स्वेक्छा से विवेक पूर्वक परिवार, धन, साधनादि के प्रति ममत्व रहित होकर मृत्यु को स्वीकारता है वह इस जन्म में भी सुखी रहता है और अगले जन्म में भी सुखी रहता है ।

जन्म एवं मृत्यु पर किसी का वश नहीं चलता है । यह एक कटु सत्य है जो इस संसार में आया है उसे एक दिन यहाँ से अकेला ही जाना ही है । किसी के साथ आज तक न तो कोई गया है और न ही कोई जा एगा--हमारे सम्बन्ध रिश्ते -नाते , मित्रता सभी कुछ पहियों की तरह होते हैं-जो मृत्यु के आगमन के साथ साथ समाप्त हो जाते हैं

जहाँ देह अपनी नहीं , तहां न अपना कोय

उनके -आकस्मिक निधन से जो पारवारिक क्षति हुई है उसे पूरा करना संभव नहीं है ।मैं अपनी ओर से अपने परिवार की ओर से एवम सम्पूर्ण जैन समाज द्वारका परिवार की ओर से ईशवर से प्रार्थना करता हूँ कि उन्हें शांति प्रदान करे और परिवार को इस दुःख एवम क्षति को हिम्मत और धेर्य के साथ सहने की शक्ति प्रदान करे |

Citizen's reporter
डॉ ० एम ० सी ० जैन 
राष्ट्रीय अध्यक्ष
राष्ट्रीय दिगम्बर जैन परिषद्(पंजीकृत) 

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