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Thursday, September 29, 2016

सुन्दरकाण्ड- सभी सुन्दर हैं !!!

मधुरिता

इसकी शुरुआत वर्णनामार्थ संसाधना से किया है। वर्ण कहते हैं अक्षर अर्थात जो नित्य है वही सत्य है। अंत में उत्तर कांड में "मानव "शब्द आया है। … जो हम सन्सार रूपी सूर्य की प्रचण्ड किरणों से दुखी मानवों विज्ञान भक्ति प्रदम तथा शिव कर्म रूपी फल प्राप्त कर लेते हैं, अतः यह रामचरितमानस रूपी वृक्ष का कल्याणकारी फल होकर सुन्दरकाण्ड तने की [साधनाकांड] है।

स्वामी तुलसीदास जी ने आठ सोपान में रामचरितमानस को लिखा है -बालकाण्ड, अयोध्याकाण्ड, अरण्यकाण्ड, किष्किन्धाकाण्ड, सुन्दरकाण्ड, लंकाकाण्ड , उत्तररामायणकांड एवं लवकुश कांड हैं।

इसमें जो पंचम सोपान सुन्दरकांड तुलसीदास जी की रचित ऐसी अमूल्य निधि है जिसका वर्णन वाणी से करना संभव नही है। केवल भावपूर्ण भक्ति से सुनना , पढ़ना और इसका मनन करने से ही इस सुंदरता रूपी रास का आनंद ले सकते हैं.

भावमयी दृष्टि से देखने पर तो ये सातों सुरों से अलंकृत हैं , जो संगीतमय होकर नवधा भक्ति से ओत -प्रोत हैं. जितने भी भी उपमा एवं उपमये हैं इन सब से पर सुन्दरकाण्ड का जीवन में पदार्पण होता है.

जहां आनंद का समावेश व भक्ति रूपी गंगा का गुणगान हो वहां स्वतः सौंदर्य उत्कृष्ट पराकाष्ठा को पार कर जाते हैं, फिर हमें उनका वर्णन करना तो दुर्लभ ही जान पड़ता है, यह वैसे ही है जैसे जिसने उसे चखा है वही आनंद का अधिकारी बन सकता है।

ज्ञानियों में अग्रगण्य सम्पूर्ण गुणों के निधन वानरों के स्वामी श्री रघुनाथ जी के प्रिय भक्त पवनपुत्र अंजनी के लाल श्री हनुमान जी महाराज को कोटि कोटि नमन। अंजनी माँ हनुमान जी को सुन्दर भी कहती थी इसमें उनका वर्णन होने के कारन इसका नाम सुन्दरकाण्ड पड़ा।

इसकी शुरुआत ही मन भावना से हुई है , सुन्दर शब्द की अमर-व्याख्या सुधा बहुत आदरणीय व चित्त को द्रवित करने वाली है। इस कांड में एक भी ऐसा प्रसंग नहीं है जो अंतमन में आदर न उत्पन्न करे. भक्ति से बह रहे रंगों में हनुमान जी ही नज़र आते हैं।

सबको मस्तक नवा कर तथा ह्रदय में श्रीरघुनाथ को धारण कर हनुमान जी हर्षित होकर सीता माता [ भक्ति] की खोज करने जाते हैं।

सिंधु तीर एक भूधर सुंदर। कौतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर॥
बार-बार रघुबीर सँभारी। तरकेउ पवनतनय बल भारी॥


समुद्र के तीर पर एक सुंदर पर्वत था। हनुमान खेल से ही (अनायास ही) कूदकर उसके ऊपर जा चढ़े और बार-बार रघुवीर का स्मरण करके अत्यंत बलवान हनुमान उस पर से बड़े वेग से उछले।

जलनिधि रघुपति दूत बिचारी। तैं मैनाक होहि श्रम हारी॥

समुद्र ने उन्हें रघुनाथ का दूत समझकर मैनाक पर्वत से कहा कि हे मैनाक! तू इनकी थकावट दूर करनेवाला है (अर्थात अपने ऊपर इन्हें विश्राम दे)।

दो० - हनूमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम।
राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम॥ 1॥

हनुमान ने उसे हाथ से छू दिया, फिर प्रणाम करके कहा - भाई! राम का काम किए बिना मुझे विश्राम कहाँ?॥ 1॥

समुन्द्र किनारे पहुँचते है समुंद्री राक्षसी और लंका में प्रवेश करते है लंकनी मिलती है , सभी बाधाओं को ऋद्धि- सिद्धि का प्रयोग कर हनुमान जी लंका में प्रवेश करते हैं।

छं० -
कनक कोटि बिचित्र मनि कृत सुंदरायतना घना।
चउहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारु पुर बहु बिधि बना॥
गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बरूथन्हि को गनै।
बहुरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहिं बनै॥


विचित्र मणियों से जड़ा हुआ सोने का परकोटा है, उसके अंदर बहुत-से सुंदर-सुंदर घर हैं। चौराहे, बाजार, सुंदर मार्ग और गलियाँ हैं; सुंदर नगर बहुत प्रकार से सजा हुआ है। हाथी, घोड़े, खच्चरों के समूह तथा पैदल और रथों के समूहों को कौन गिन सकता है! अनेक रूपों के राक्षसों के दल हैं, उनकी अत्यंत बलवती सेना वर्णन करते नहीं बनती।

बन बाग उपबन बाटिका सर कूप बापीं सोहहीं।
नर नाग सुर गंधर्ब कन्या रूप मुनि मन मोहहीं॥
कहुँ माल देह बिसाल सैल समान अतिबल गर्जहीं।
नाना अखारेन्ह भिरहिं बहुबिधि एक एकन्ह तर्जहीं॥


वन, बाग, उपवन (बगीचे), फुलवाड़ी, तालाब, कुएँ और बावलियाँ सुशोभित हैं। मनुष्य, नाग, देवताओं और गंधर्वों की कन्याएँ अपने सौंदर्य से मुनियों के भी मन को मोहे लेती हैं। कहीं पर्वत के समान विशाल शरीरवाले बड़े ही बलवान मल्ल (पहलवान) गरज रहे हैं। वे अनेकों अखाड़ों में बहुत प्रकार से भिड़ते और एक-दूसरे को ललकारते हैं।

ऐसे वर्णातीत लंका में हनुमान जी की मित्रता विभीषण से होती है , वे हनुमान जी को माता सीता का पता बताते हैं। अशोक वाटिका में पहुँच कर वे देखते हैं की कपटी रावण सीता माता को अपनी पटरानी बनाने का प्रलोभन दते हुए साम -दंड-भेद नीति से उन्हें आतंकित कर रहा है.

स्याम सरोज दाम सम सुंदर। प्रभु भुज करि कर सम दसकंधर॥
सो भुज कंठ कि तव असि घोरा। सुनु सठ अस प्रवान पन मोरा॥

(सीता ने कहा -) हे दशग्रीव! प्रभु की भुजा जो श्याम कमल की माला के समान सुंदर और हाथी की सूँड़ के समान (पुष्ट तथा विशाल) है, या तो वह भुजा ही मेरे कंठ में पड़ेगी या तेरी भयानक तलवार ही। रे शठ! सुन, यही मेरा सच्चा प्रण है।

सीता व्याकुल होकर प्रभु श्रीराम को याद करती है , उसी समय हनुमान जी राम नाम अंकित मनोहर अंगूठी माता के सन्मुख डाल देते हैं।

तब देखी मुद्रिका मनोहर। राम नाम अंकित अति सुंदर॥
चकित चितव मुदरी पहिचानी। हरष बिषाद हृदयँ अकुलानी॥


तब उन्होंने राम-नाम से अंकित अत्यंत सुंदर एवं मनोहर अँगूठी देखी। अँगूठी को पहचानकर सीता आश्चर्यचकित होकर उसे देखने लगीं और हर्ष तथा विषाद से हृदय में अकुला उठीं।

सीता माता को संदेह होता है की कहीं यह माया का खेल तो नहीं है ? तब हनुमान जी अपना विशालकाय शरीर प्रगट करते हैं और माता को अपने राम भक्त होने का भरोसा दिलाते हैं।

सुनहु मातु मोहि अतिसय भूखा। लागि देखि सुंदर फल रूखा॥
सुनु सुत करहिं बिपिन रखवारी। परम सुभट रजनीचर भारी॥

हे माता! सुनो, सुंदर फलवाले वृक्षों को देखकर मुझे बड़ी ही भूख लग आई है। (सीता ने कहा -) हे बेटा! सुनो, बड़े भारी योद्धा राक्षस इस वन की रखवाली करते हैं।

हनुमान जी अशोक वाटिका के वृक्षों को उजाड़ देते हैं, और राक्षसों और रक्वालों को मसल देते हैं , तब मेघदूत उन्हें ब्रह्मपाश में बांध कर रावण के समीप ले जाते हैं रावण व हनुमान जी का प्रसंग बहुत ही मनोहारी है। जिसके लवलेश मात्र से ही महान बने हो , जिनके बल से ब्रह्मा, विष्णु, महेश सृष्टि का सृजन पालन और संहार करते हैं , में उन्हें राम जी का दूत हुँ. ऐसा परिचय केवल रामभक्त हनुमान जी ही दे सकते है.

ढोल नगाड़ों के बीच हनुमान जी ने सारी लंका जला दी केवल रामभक्त विभीषण का घर सुरक्षित रहा। छोटा रूप धर कर हनुमान जी जानकी जी के सन्मुख हाथ जोड़ कर खड़े हुए और और उनसे चूड़ामणि लेकर श्रीराम के पास पुनः वापस आते हैं।

सारा वृतांत सुन कर राम के नयन भर जाते हैं ,प्रभु उनको बार-बार उठाना चाहते हैं, परंतु प्रेम में डूबे हुए हनुमान को चरणों से उठना सुहाता नहीं। प्रभु का करकमल हनुमान के सिर पर है। उस स्थिति का स्मरण करके शिव प्रेममग्न हो गए।

सावधान मन करि पुनि संकर। लागे कहन कथा अति सुंदर॥
कपि उठाई प्रभु हृदयँ लगावा। कर गहि परम निकट बैठावा॥

फिर मन को सावधान करके शंकर अत्यंत सुंदर कथा कहने लगे - हनुमान को उठाकर प्रभु ने हृदय से लगाया और हाथ पकड़कर अत्यंत निकट बैठा लिया।

राम जी का आदेश मिलते ही वानर , भालू और रीछ की सेना विजय घोष करते हुए समुन्द्र तट पर आ उतरी। लंका में केवल एक दूत [अंगद] के आगमन से ही आतंक छा गाय. मंदोदरी का रावण से वार्तालाप कारन अत्यंत मर्मस्पर्शी है।

मुनि पुलत्स्य जी, मंत्री मलयवान , छोटे भाई विभीषण के अनुनय-विनय करने पर रावण क्रोधित होकर उन्हें राज्य से बाहर निकाल देता है।

विभीषण का श्रीराम से मिलाना होता है। जो सम्पत्ति रावण अपन दस शीश देने के बाद रावण को लंका स्वरुप मिली थी उसे करुणानिधान श्रीराम सहज ही विभीषण को दे देते हैं।

राम सेना का समुन्द्र पार करने का प्रसंग भी अत्यंत रोचक है। तीन दिन बीत जाने के बाद भी जब समुन्द्र के ऊपर वंदन करें का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है तब श्रीराम जी धनुष वाण उठा लेते हैं

लछिमन बान सरासन आनू। सोषौं बारिधि बिसिख कृसानु॥
सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीति। सहज कृपन सन सुंदर नीति॥


हे लक्ष्मण! धनुष-बाण लाओ, मैं अग्निबाण से समुद्र को सोख डालूँ। मूर्ख से विनय, कुटिल के साथ प्रीति, स्वाभाविक ही कंजूस से सुंदर नीति (उदारता का उपदेश),

ममता में फँसे हुए मनुष्य से ज्ञान की कथा, अत्यंत लोभी से वैराग्य का वर्णन, क्रोधी से शम (शांति) की बात और कामी से भगवान की कथा, इनका वैसा ही फल होता है जैसा ऊसर में बीज बोने से होता है (अर्थात ऊसर में बीज बोने की भाँति यह सब व्यर्थ जाता है)।

तब समुन्द्र हाथ जोड़ कर प्रगट होते हैं और मर्यादा में रहते हैं ,नलनील ऋषि द्वारा प्रदत वरदान के कारण भारी भारी पत्थरों को रामनाम लिख कर समुन्द्र में तैरा कर पूल बांधते हैं। समस्त सेना प्रभु राम को अपने ह्रदय में धारण कर युद्ध की तैयारी करते हैं।

भगवान ने स्वयं कहा है की वे साधु -संतों , भक्तों का कल्याण करने व उन्हें संसार से तारने के लिए समय समय पर प्रगट होते हैं। पूर्ण शरणागत हनुमान नाम का आश्रय लेकर इतना जटिल और असंभव कार्य कर पाते हैं।

यह संसार रूपी रोग की औषधि है। श्री रघुनाथ जी गुणगान सम्पूर्ण संपूण सुन्दर मंगलों को देने वाला है। जो सुन्दर कण को आदर सहित पढेंगें, सुनेगें या मनन करेगें वे सहज ही अन्य साधनों के प्रयोग किये बिना ही भवसागर तर जायेंगें।

हनुमान जी सेतु का कार्य करते है , भक्तों व भगवान के मध्य यही सुन्दरकाण्ड का स्वतः सिद्ध सत्य है.

Join hands with Dwarka Sri Ramlila Society(Regd ) & be a part of this Mega Event


पंजाबी ग्लोबल फाउंडेशन अवार्ड से अभिनेता ‘बब्बू मान’ को सम्मानित किया गया


-प्रेमबाबू शर्मा

मुमंई में समाजिक संस्था पंजाबी ग्लोबल फाउंडेशन द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में गुरप्रीत कौर चड्ढा अभिनेता ‘बब्बू मान’ को सम्मानित किया। गुरिंदर सीगल, काव्या राजपूत, वर्षा हरिनखेड़े,अनन्या चड्ढा,राज सूरी, बसंन्त रसिवासिया, गणान्य चड्ढा जैसी अनेक हस्तियांे ने शो में भाग लिया।

बब्बू मान का नाम और उनकी लोकप्रियता से सभी परिचित है,लोकगीत,भंगडा,पाॅप गीत और गजल के माध्यम से उनको एक अलग पहचान मिली। इसके अलावा वे एक सफल अभिनेता,निर्माता,गीतकार और संगीतकार भी हंै। हिन्दी फिल्म हवाएं,रव ने बनाई जोडीयां,देशी रोमांश,इकाम में उनके काम की सराहना हुई। बब्बू मान ने पुरस्कार लेने के बाद खासे उत्साहित नजर आएं। उनका कहना था कि संस्था ने मुझे जो सम्मान दिया,ये मेरे लिए गर्व की बात है।

Education must transform

ANURADHA GOVIND
PRINCIPAL - J M INTERNATIONAL  SCHOOL

Over the years, with competition getting tougher every year and seats getting fewer in college, the education system has still not changed. Here is a look into the current education system in India and how we need to change it.

To deliberate on the purpose of education of education, let’s go by tracing its roots. It is popularity known to be derived from the Latin word ‘edu co’-which means ‘to educe’ or draw out’. There are some other root words too, like, ‘Educare’ which means ‘to bring up’ and ‘Educare’ which means ‘to draw out from within’. Education, rather a good and purposeful education, should act as a stimulant for a students’ mind. It should be able to draw the students to correlate what they read in the text-books with the real world around them. Educating a child is not filling up his mind with all kinds of facts and figures, but to ignite his/her mind to find, explore, analyze and learn. The vital need is to develop love for learning and interest to know more and more. Once this goal is attained, the ground for ‘good and meaningful education’ is ready. It is “though” a creative process which eventually develops overall personality of the children. Through this, we can transform the students into dynamic and result oriented citizens with a mind of their own and with the courage to mouth their opinion to go beyond instructing from the book. Arousing the curiosity of students is perhaps one of the most important aspects of teaching-learning because once this is done, a student starts making self driven effort to explore and learn on his own. Here group dynamics plays a major role too. Therefore, there should be a strong emphasis on participatory learning, group work and collaborative projects. This enhances the emotional quotient of children and the spirit of team work, collaboration, respecting each other’s view point and sharing opinions without offence. This mind training is of utmost important a team.

When we talk about transformation, yes education must transform the mind, soul and personality. Therefore it is not only through knowledge but also through instilling value systems and life skills in children, so that they are not just equipped to earn a living but also to live a happy and purposeful life. Such righteous students become the sensitive citizens who lead to the evolution of enlightened and caring society. That should be the mission of education.

The purpose and mission of education guides are vision for the school. Does vision reflect a school having a big and fancy building? Having a big laboratory? Or having a big infrastructure? Not at all; Great schools must have great teachers who love teaching and with great vision. The vision should be to make a beautiful school which generates a safe, secure and happy environment for promoting exploration, creativity and real learning for the development of righteous youth who are an asset to the school, family, society, nation five minds for the future, as described by Howard Gardner - The disciplinary mind, the synthesizing mind, The creative mind, the respectful mind and the ethical mind.

No syllabus can teach such things; no textbook can develop such minds. It has to be imbibed in the overall culture and vision of the school. the creative approach of the school and the way of life of mod.

Coming to the final and most important aspect of the right approach to education ‘who should be the centre of education, if we revisit our vision, mission, purpose and outcome; all of them lead to a single objective. It is ‘the child’, who must be central to all experiences leading to learning therefore good school must aim at providing a secure and encouraging environment that strengths, develop life skills, productive habits and sensitivity for fellows and society and courage to speak his/her mind..

To impart education that brings transformation in the child, the school may not have fancy building or five star commodities but it must have holistic curriculum, engaged children, motivated teachers, assured parents, and inspiring role-models.

Note: Principal & educationists are invited to send articles on Better education for publishing in Dwarka Parichay.  email: info@dwarkaparichay.com ) 

NAVARATHRI CELEBRATIONS at Sri Ram Mandir Dwarka


NAVARATHRI CELEBRATIONS (Saturday 01st OCTOBER 2016 To Tuesday 11th OCTOBER 2016) CHANDI HOMAM on Tuesday 11th OCTOBER 2016 With the blessings of Goddess Kameshwari, Sri Ram Mandir, Sector 7, Dwarka, New Delhi, will be conducting Navarathri Celebrations from Saturday 01st October 2016 to Wednesday 11th October 2016, as per the following programme: Daily Programme from 01st October 2016 to 10th October 2016 Daily at 9.00 AM Lalitha Sahasranama Archanai to Devi Kamehswari




Devotees interested in participating in the above sewa, are requested to give details like Gotharam, Nakashatram, Rasi and Name along with the above amount to the Manager during temple timings. Devotees can remit online to The Delhi Bhajana Samaj Sri Ram Mandir Trust Savings Account No : 2948101052633, Canara Bank, CCRT Dwarka, IFSC Code : CNRB0002948, after remitting please send email. Devotees are requested to attend in large numbers and be recipient of the blessings of Goddess Kameshwari on the above occasion.

Temple Management Committee
9312247576, 9968093927, 9810138189, 9868231042, 9810874834
E-mail: mandir.dwarka@gmail.com Web : www.srirammandirdwarka.org

Be careful in sending messages...


Dr.M.C.Jain

We all know that scientific development in the country has changed the way or our living altogether. This, we often see and feel when we compare our way of living specially in flashing out/or sending our message via electronic media which includes internet, face book , whatsapp , text messages or mails etc. etc. This is a good development in the modern age but it becomes painful and punishable when messages are sent using a very filthy, harmful, indecent or obscene language to someone publicly or in a group so formed. The motive behind of sending such type of messages is to take revenge, or to insult or to disgrace the others in the eyes of family, or members or community or Samaj and so on. Sometimes it is felt that the sender of the messages crosses all the boundaries and limits of moral values, manners, rectitude and probity which, we all know, are against the norms, decency and ethics of morality and also law.

Now a days we all are sending messages via either mails, or face book or whatsapp etc etc to our friends, to the individuals/or in the group so formed for the purpose. We also know that group (s) is being formed/created by a single person and he or she becomes its Admin and later on he or she authorizes others to be its Admin also. But in all cases the creator of the group is considered as main Admin and is responsible for all cause and affects if happens otherwise.

Sending messages to any one via any mode using filthy and indecent language may invite trouble to the sender and the Admin too. Such of his or her act is dealt as per the Cyber Crime Law under various Acts of law including Section 67 of the Information Technology Act, 2000. He or she may be punished on first conviction with imprisonment of either description for a term which may extend to five years and with fine which may extend to one lakh rupees and in the event of a second or subsequent conviction with imprisonment of either description for a term which may extend to ten years and also with fine which may extend to two lakh rupees.

It is my earnest appeal to our friends, members and known in person and all in large to please remain careful while sending their messages to anyone including in the group. It is also appeal to the Admin (s) to see that in her or his group no one plays any such act which may invite him or her in trouble.

राघव ललन तेरे कोमल चरण...




राघव ललन तेरे कोमल चरण...   
 भजन - श्रीमती विद्दुत झा

Click for video @ You Tube:
http://youtu.be/mZNeHg0kL9g 

Wednesday, September 28, 2016

लेखक निर्देशक अरशद सिद्दीकी अब निर्माता बने

-प्रेमबाबू शर्मा

अरशद सिद्दीकी जिन्होंने लेखक के रूप में ‘मार्केट’ और ‘लाल सलाम’ जैसी फिल्में दी हैं, साथ ही अभिनेत्री युक्ता मुखी के साथ फिल्म ‘मेमसाहेब’ का निर्देशन भी किया है, अब स्वयं को निर्माता, निर्देशक के रूप में फिल्म एक तेरा साथ के साथ आ रहे हैं, यह फिल्म उन्होंने अपने गुरु स्वर्गीय श्री के के सिंह के याद में बनायीं है। इस फिल्म का निर्माण अरशद ने अपने बैनर ‘आईफा स्टूडियो’ के साथ ‘बाबा मोशन पिक्चर्स’ के संग निर्माण किया है। अपने अनुभव के आधार पर अरशद ने अपनी प्रोडक्शन कंपनी की शुरुआत सुरक्षित रूप से शुरू करने के लिए एक ऐसे विषय को चुना जो सुपर नेचुरल पर आधारित है, ऐसी फिल्मो को सिर्फ बेहतरीन पटकथा, दृश्यांकन एवं निर्देशन की जरूरत होती है, न की फिल्मी सितारों की, इसलिए उन्होंने इस फिल्म में टी वी के लोकप्रिय अदाकार शरद मल्होत्रा के साथ हृतु दुदानी एवं मेलानी नाजरेथ को कास्ट किया।

फिल्म एक तेरा साथ“ की कहानी एक ऐसे पारलौकिक गतिविधियों पर आधारित है जो हमारे आसपास वातावरण में होती रहती है, पर जिसे हम कभी समझ पाते हैं, कभी नहीं, इसकी शूटिंग ओरिजिनल एवं रोमांचक लोकेशन पर की गयी है जैसे घाणेराव, जैसलमेर, जोधपुर, दिल्ली, चंडीगढ़, शिमला एवं मुम्बई में। लोकप्रिय गायक रहत फतेह अली खान इस फिल्म के दो गीतों को अपनी आवाज से सजाया है, यह फिल्म 21 अक्टुबर प्रदर्शित हो रही है, साथ ही एक हॉरर एवं रहस्यात्मक फिल्म होने के अलावा यह पारिवारिक फिल्म भी है।
फिल्म में मुख्य कलाकारों में कलाकार शरद मल्होत्रा, हृतु दुदानी, मेलानी नाजरेथ, दीपराज राणा, विश्वजीत प्रधान, पंकज बैरी, गार्गी पटेल, पदम् सिंह, अनुभव धीर, अपराजिता महाजन एवं कृष्णा राज है। 
 
निर्माता आईफा स्टूडियो , प्रदीप के शर्मा एवं वी नाजरेथ, सह निर्माता अनुभव धीर एवं फरजाना सिद्दीकी, एसोसिएट निर्माता नितेश जांगिड़, लियाकत नासिर, लेखक निर्देशक अरशद सिद्दीकी, संगीत सुनील सिंह, लियाकत अजमेरी, अली ‘पीकू’ एवं नवाब खान, गीत ए एम तुराज, डा देवेंद्र काफिर, असलम सिद्दीकी और हुस्ना खान, गायक उस्ताद राहत फतेह अली खान, सोनू निगम, के के, शाहिद मालया, अमन त्रिखा, भूमि त्रिवेदी और स्वाति शर्मा हैं।

3rd SAMMAAN 2016 award on Women Empowerment


Sachdeva Global School Dwarka organised special assembly on ‘Green Schools Programme’


The Science and Environment Club of Sachdeva Global School Dwarka organised the special assembly on ‘Green Schools Programme’ on Thursday 4th August’2016 with an aim to sensitize students to the environment and empower them to use natural resources in a responsible and an efficient manner.

The speech on the “need to adopt Green Schools Programme and the benefits of auditing”, Alarming Environment facts and a beautiful poem recited by the Globalites were very informative and depicted the importance of “learning to live sustainably”. The skit based on Environmental concepts and solutions was appreciated and was successful in spreading the message of CSE green schools programme to work towards change.

Audit teams were announced and the head of the school Ms.Sumana Dutta Sarkar gave the badges to the student of respective teams. The assembly concluded with the song “Heal the world”.

Thanks for your VISITs

 
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