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Tuesday, July 4, 2017

पाश्चात्य सभ्यताया शैली और भारतीय नारी

रविंदर सिंह डोगरा 

वैसे तो में पिछले कई सालों से हिंदी लेख सामाजिक विषयों पर लिखता हूँ परन्तु काफी समय से वाट्सअप के आने के बाद थोड़ा काम लिख पता हूँ क्यूंकि रोज़ अपनेविचार वाट्सअप के माध्यम से ही लोगों तक पहुंचा देता हूँ ! लेकिन फिर भी कुछ बाते ऐसी होती हैं जो हम वाट्सअप पर नहीं समझा सकते या यूँ कहिये की आपसबके और अन्य बुद्धिजीवियों या समाज के प्रबुद्ध और जन प्रतिनिधियों वैसे तो में पिछले कई सालों से हिंदी लेखन सामाजिक विषयों पर लिखता हूँ परन्तु काफी समय से वाट्सअप के आने के बाद थोड़ा काम लिख पता हूँ क्यूंकि रोज़ अपने विचार वाट्सअप के माध्यम से ही लोगों तक पहुंचा देता हूँ ! लेकिन फिर भी कुछ बाते ऐसी होती हैं जो हम वाट्सअप पर नहीं समझा सकते या यूँ कहिये की आप सबके और अन्य बुद्धिजीवियों या समाज के प्रबुद्ध और जन प्रतिनिधियों तथा हमारे देश की सरकार के मंत्रियों के नंबर मेरे पास हैं नहीं इस्सलिये आप सब तक ईमेल के माध्यम से ही एक बहुत हम बात रखने जा रहा हूँ कृपया ध्यान जरूर दे !

हिंदुस्तान में हर सरकार चाहे देश की हो या किसी प्रदेश की भारतीय सभ्यता , संस्कृति और परम्पराओं को बहुत मान्यता देती है और हर प्रदेश अपने प्रदेश की तथाहर सरकार हिंदुस्तान देश की संस्कृति , सभ्यता और परम्पराओं को आधुनिक युग में भी बनाये रखने की भरपूर कोशिश करते हैं इसीलिए , योग , शिक्षा , भाषा व्हिंदुस्तान के गौरवशाली इतिहास और महापुरुषो देवियों के बारे में बता कर युवाओं और महिलाओं - पुरुषो को प्रेरित करते हैं इतना ही नहीं , सरकारों के भाषा एवंसंस्कृति विभाग, बहुत से कार्यक्रम चला कर करोडो रूपए खर्च कर के सामाजिक मूल्यों पर देश के हर वर्ग को इंसानियत और महिलाओं के प्रति या उनके अधिकारों केप्रति सजग करते है ! बड़े - बड़े नेता , सामाजिक लोग , अभिनेता , धनाढ्य , ऊँचे परिवार , बड़े - बड़े व्यसायी , बड़ी बड़ी संस्थाएं , प्रधानमंत्री -मंत्री , मुख्यमंत्री यहाँतक की हिंदुस्तान के प्रथम नागरिक माननीय महामहिम राष्ट्रपति जी भी अनेको - अनेक कार्यकर्मों में ऐसी बातों के लिए शिरकत करते हैं और अपने विचार रखते हैं या चर्चा अथवा बहस भी होती है ! और ये सब पिछले 25 - 30 सालोँ से होता आ रहा है क्योंकि जितनी देश में महंगाई बड़ी है , जितना देश में नशा बड़ा है , जितना देशमें भ्रष्टाचार बड़ा है , जितना देश में घोटाला हुआ है जितना देश में नक्सलवाद या आतंकवाद बड़ा है , जितना देश में साम्प्रदायिक तनाव बड़ा है उस से कहीं ज़ादाभारतीय महिलाओं पर अत्याचार बड़ा है और उनका शोषण बड़ा है, जिस पर कोई सार्थक कदम आज तक किसी ने नहीं उठाया है ! 

सबसे बड़ी बात यह है की, किसी नेये आज तक नहीं सोचा ही नहीं की जिस देश की महिलाओं माताओं का इतिहास चाहे कौशलया , कैकई या मन्थरा ( रामायण ) चाहे कुंती , गांधारी , द्रौपदी (महाभारत ) चाहे रानी लक्ष्मीबाई हो या चाहे माता जीजाबाई या चाहे रानी जोधाबाई हो या सवित्रिफुले या फिर कोई और ....! इनमें से भले ही कैकई-मन्थरा या गांधारी- द्रौपदी बेहद तेज़ तरार व् अपने फायदे के लिए उन्होंने कुछ किया हो पर उनका चरित्र या दामन दागदार नहीं था और ना ही उनके नारीत्व में कोई खोट ..! फिर ये कैसे हो गया की ऐसी महान माताओं और वीरांगनाओ के हिंदुस्तानी वंशज हम आज अपनी ही माताओं बहनो की इज़्ज़त तार - तार कर देते हैं और हमारे ही परिवार एकदूसरे की मदद को आगे नहीं आते ..! किसी ने आप सब में से सोचा है ऐसा क्यों हो रहा है ....? चलिए में बताता हूँ ये सब इस लिए हो रहा है क्योंकि पाश्चात्य सभ्यताया शैली को हमने भारत में बहुत समर्थन दिया ! दूसरे देशो के बारे में जानकारी होना अच्छी बात है पर ये जरुरी नहीं के हम उनकी सभ्यता या गलत शैली को अपनाएं! खान - पान तक तो ठीक था लेकिन जब परिधान से लेकर अंग वस्त्र तक की नुमाइश पाश्चात्य तौर-तरीके से हमने हिंदुस्तान में करनी शुरू कर दी जानकारी के नामपर तो, “जो सामाजिक शर्मो-ह्या हिन्दुस्तानियों के दिलो दिमाग और मन में थी वो धीरे धीरे ख़तम हो गयी “ जिसका नतीजा ये हुआ की पुरुष प्रधान समाज नेआधुनिकता के नाम पर पहले तो भारत की नारी को आगे किया और फिर उसका शोषण हर स्तर हुआ जिसका खुद भारतीय नारी को भी पता नहीं चला ! 

ये वो दौर थाजब सिनेमा को एक पथ प्रदर्शक और प्रेरणा दायक कहानियों के लिए देखा जाता था और सबसे पहले प्रयोग महिलाओं के ऊपर वहीँ हुआ और वहां से जो देख के लोगनिकले तो आज भारत की नारी का अकेले निकलना मुश्किल हो गया ! दूसरा दौर आया सियासत का क्योंकि जब लोगो ने या कुछ महिलाओं ने आवाज़ उठाना चाही तोमहिलाओं को ही सियासत में लाया गया लेकिन सिर्फ चुप करवाने या अपना हित साधने के लिए जो आज तक हो रहा है ! तीसरा दौर शुरू हुआ गैरसरकारी संगठनों का, जहाँ सामाजिक चोला इख्तियार करके पाश्चात्य सभ्यता को अंदर से बढ़ावा दिया गया, जिस वजह से भारत में भी समलैंगिकता को बढ़ावा मिला और भारतीय युवकयुवतियाँ अपने अधिकार की बात कर के समलेंगिकता का सहयोग करने लगीं ! यहाँ तक आते - आते भारत पूरी तरहं से पाश्चात्य सभ्यता की बुरी आदतों में पड़ करअपने ही देश की महिलाओं का तिरस्कार करने लगा और महिलाओं की कानून में भी ज़ादा सुनवाई नहीं होती थी ! जिससे आहत हो कर महिलाओं ने भी पुरुषो कोजवाब देना शुरू कर दिया इतना ही नहीं महिलाओं ने भी खुल कर पुरुष मित्र बनाना शुरू कर दिए और हिंदुस्तान में भी एक्स्ट्रा मेरिटल अफेयर्स आम बात होगयीइसके साथ ही तलाक के केसो में 100 % वृदि भी दर्ज़ हुयी ! यहाँ तक की कुछ महिलाओं ने अपना हक़ पाने के लिए पुरुषो पर शोषण के झूठे आरोप भी लगाना शुरू करदिए जिस पर माननिये न्यायलय ने नाराज़गी व्यक्त भी की थी 2012 में ! लेकिन महिलाओं द्वारा शोषित किये जाने का आंकड़ा पुरुषों द्वारा शोषित किये जाने सेकाफी कम था ! 

 पाश्चात्य सभ्यता की हैवानियत इतनी बढ़ी, की दिल्ली में निर्भया कांड हुआ और ऐसे और कई कांड हुए जिसके बाद लोग जागे और महिलाओं केप्रति उनकी संवेदनाएं भी जागी ! लेकिन फिर भी बलात्कार जैसे कुकृत्यों पर रोक नहीं लगी ! हाँ अलबत्ता अपराधों में अपराधियों की धरा पकड़ जल्दी होना शुरूहोगयी परन्तु परिणाम आने बाकी हैं ! जिस पर शायद कुछ लोगो और पाश्चात्य सभ्यता को अपनाने वाले लोग या फ़ैलाने वाले लोगो को तकलीफ हुयी और और...और इसी बीच मैंने 30 जून को भारत के एक राष्ट्रिय अखबार में पाश्चात्य सभ्यता का एक लेख पड़ा जिसको अखबार ने आखिरी सफ़े पर छापा था जिसको पढ़नेके बाद मेरे होश उड़ गए, हालाँकि अखबार ने एक सुचना के तहत या खबर के तहत वह लेख छापा था जोकि हर अखबार का काम भी है ! मेरे साथियों उस अख़बार के लेख का शीर्षक था ... " विवाहत्तेर सम्बन्ध बनाने वाली महिलाएं रहती हैं ज़ादा फिट " यानी के जो महिलाएं शादी से पहले से ही शारीरिक सम्बन्ध बनाना शुरू कर देंगी , वो शारीरिक और मानसिक रूप से ज़ादा सशक्त होंगी ...! मैं सोच रहा था की क्या मेरी तरहं आप लोगों ने भी वो लेख पड़ा होगा या पड़ा होगा तो क्याप्रतिक्रिया होगी या क्या कोई बुद्धिजीवी , सामाजिक संगठन , कोई नेता , मंत्री , इस पर खंडन करेगा या कुछ कहेगा पर तीन दिन तक किसी ने कुछ नहीं कहा संभवतःया तो किसी ने पड़ा नहीं होगा या फिर उन्हें लगता होगा की क्या जरुरत है ! हालाँकि सर्वे विदेश की किसी कम्पनी ने किया है और उसने विदेशियों का ही हवाला दियाहै पर समझने वाली बात यह है की उनको या किसी को भी ये बात भारत मैं बताने की जरुरत क्यों है , या क्यों पड़ी ....? ज़रा सोचिये अन्य पाश्चात्य बातो यानि केखाना-पीना , कपडे , फिल्में आदि आदि की तरहं , क्या हम ये बात भी स्वीकार करलेंगे ...? क्या हम अपनी भावी पीड़ी की बच्चियों , बेटियों को ये कह सकेंगे, क्या मैंया कोई और अपनी बहिन बेटी को ये प्रेरणा देगा की जाओ शादी से पहले किसी से सम्बन्ध बना लो क्योंकि इस से तुम्हारा शरीर फिर रहेगा .....? मैं समझता हूँ आपसबको और देश के नेताओं को बुद्धिजीवी , सामाजिक संगठनो को , और अपने आप को भारतीय कहने वाले सभी लोगो को मेरी बात समझ आ गयी होगी ! खास तौरसे उनको जो योग और शाकाहार की वकालत करते हैं उन्हें चाहिए की ऐसे बातों का खंडन करें और लोगो को भी समझएं !

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