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Tuesday, January 17, 2017

स्वर्गीय श्री धर्मवीर जी जैन - प्रधान एवम संस्थापक रत्नत्रय दिगम्बर जैन मंदिर द्वारका

--- एक झलक एवम व्यक्तित्व

स्वर्गीय श्री धर्मवीर जी जैन का आकस्मिक निधन समाज और परिवार के लिए एक न भूलने वाला सत्य है । मृदु भाषी , सहन शील और धार्मिक विचारों से ओत प्रोत स्वर्गीय श्री धर्मवीर जी विलक्षण प्रतिभा के धनी थे। श्री धर्मवीर जी ने अपना जीवन एक अध्यापक के रूप में प्रारंभ किया । सामाजिक और पारिवारिक उत्तरदायित्यों के प्रति वे हमेशा सजग रहे I उनके संस्कार उनके परिवार में विशेषतः पुत्र और पुत्र वधुओं में कूट कूट कर भरे हुए हैं । सादगी और संयम उनके जीवन का एक मात्र उदेश्य था । अपने जीवन काल में वे अपने उत्तर दायित्यों के प्रति पूरी तरह सजग रहे । अपने जीवन के अंतिम वर्ष सादगी, समर्पण और धार्मिक अनुष्ठानों के प्रति समर्पित करते हुए दिनांक 15 जनवरी 2017 को प्रातः 6 30. पर अपने जीवन की अंतिम साँस ली और अपने पुत्र , पुत्रियों ,बहुओं एवं पौत्र -पौत्रियों को छोड़ कर इस संसार के विदा हो हो गए । शास्त्रों में कहा गया है -

"आप अकेला अवतरे, मरे अकेला होए, यूं कबहू इस जीव का साथी सगा न कोय”

अपने जीवन काल में धर्म के प्रति उनकी अपार श्रधा रही । अध्यापक के रूप में कार्य- रत होते हुए अपने जीवन काल में उन्होंने अनेक उतार चदाव देखे लेकिन सत्य के मार्ग से कभी भी विचलित होना नहीं सीखा। उनके विचारों में हमेशा ध्रढता झलकती थी । उनका व्यक्तित्व तथा स्वरुप जैन समाज के लिए एक उदाहरण है ।

मृत्यु जीवन का अनिवार्य और स्वभाविक सत्य है इस वास्तविकता को हमें अपने मन में स्थापित कर लेना चाहिए महाभारत काल में यक्ष ने युधिस्ठर से अपने प्रश्नों में एक बात यह पूछी थी क़ि संसार में सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है युधिस्ठर का अविस्मरणीय उत्तर था क़ि सबसे बड़ा आश्चर्य यह है क़ि हम प्रतिदिन देख रहे हैं कि लोग निश्चित रूप से मृत्यु को प्राप्त हो रहे हैं फिर भी ऐसा व्यहार कर रहे है क़ि जाने बाले तो चले गए पर हम नहीं जायेगे

भ्रम की इस स्थिति से बाहर आकर हमें मृत्यु के सत्य के प्रति आश्वत होना है। मृत्यु परमात्मा का उतना ही मंगलकारी वरदान है जितना जन्म ये सोच हमें पाप कर्मो से बचने की चेतावनी देता है मृत्यु का अहसास हमें अपने कर्तव्यों और दायित्यों के प्रति सजग करता है

जीवन और मृत्यु संसार के ऐसे दो पढ़ले हैं जिनकी कि बाग डोर केवल ईश्वर के हाथों में है । ये ऐसा चक्र है जिससे न तो आज तक कोई बच सका है और न ही बचेगा । पंडित भूदर दास जी द्वारा कृत बारह भावना की वो पंक्तियाँ --

राजा राणा छत्रपति , हाथिन के असवार , मरना सब को एक दिन अपनी अपनी बार,- हमारे इस नश्वर जीवन का यथार्थ रूप प्रस्तुत करती हैं ।

स्वर्गीय श्री धर्मवीर जी जैन का जीवन भी इसी चक्र का एक हिस्सा रहा। अत्यन्त ही धार्मिक विचार सादगी और संयम उनके जीवन का एक मात्र उद्देश्य था

धर्म और वीर --इन दो शव्दो से निर्मित -स्वर्गीय श्री धर्मवीर जी जैन समुदाय द्वारका के लिए प्रेरणा श्रोत रहे सरकारी सेवा से निवर्त होने के पश्चात् उनका सम्पूर्ण जीवन जैन धर्म के प्रति समर्पित रहा जिसका एक मात्र जीता जागता उदाहरण रत्नत्रय दिंगम्बर जैन मंदिर द्वारका हम सभी के सामने है आने वाली पीढ़ियां में रत्नत्रय दिगम्बर जैन मंदिर द्वारका के नाम के साथ साथ उनके नाम को भी हमेशा श्रद्धा और सम्मान के साथ याद किया जायेगा

इस शोक की घडी में संतप्त परिवार के लिए परम पूज्य ऐलाचार्य मुनिराज श्री प्रज्ञ सागर जी ने इस दुःख में मंगल कामना करते हुए केवल यही कहा है कि आयु के समाप्त होने से मृत्यु होती है । जो जन्मा है उसकी मृत्यु भी निश्चित है और जो मरता है उसका पुनः जन्म भी निश्चित है । कर्मवद्ध जीव चाहे जितना भी प्रयत्न करले परन्तु मृत्यु से बच नहीं सकता । मृत्यु का आगमन निश्चित है मुनि श्री ने परिवार की मंगल कामना करते हुए धर्म वृद्धि का आशीर्वाद दिया है उन्होंने कहा है कि जैन शास्त्रों के अनुसार मृत्यु महानिद्रा है , मरण मंगल धर्म का स्वरूप है नव जीवन दायिनी है और वह दुःख मुक्त करने वाली है । जीवन को गुणों से समृद्ध बनाने के लिए मरण का स्मरण आवश्यक है। मृत्यु की स्मृति के बिना जीवन में प्रगति , साधना, एवं रत्नत्रय की उपासना में अप्रमत्ता नहीं आ सकती । ईश्वर परिवार का कल्याण करे |

यह सत्य है के जीवन और मृत्यु प्रत्येक सांसारिक प्राणी के साथ लगे हुए हैं । जो प्राणी धर्माचरण करता , सत्कर्म में संलग्न है, सुवर्ती है और प्रत्येक कार्य में संयम और दया रखता है वह मृत्यु के क्षणों में स्वेक्छा से विवेक पूर्वक परिवार, धन, साधनादि के प्रति ममत्व रहित होकर मृत्यु को स्वीकारता है वह इस जन्म में भी सुखी रहता है और अगले जन्म में भी सुखी रहता है ।

जन्म एवं मृत्यु पर किसी का वश नहीं चलता है । यह एक कटु सत्य है जो इस संसार में आया है उसे एक दिन यहाँ से अकेला ही जाना ही है । किसी के साथ आज तक न तो कोई गया है और न ही कोई जा एगा--हमारे सम्बन्ध रिश्ते -नाते , मित्रता सभी कुछ पहियों की तरह होते हैं-जो मृत्यु के आगमन के साथ साथ समाप्त हो जाते हैं

जहाँ देह अपनी नहीं , तहां न अपना कोय

उनके -आकस्मिक निधन से जो पारवारिक क्षति हुई है उसे पूरा करना संभव नहीं है ।मैं अपनी ओर से अपने परिवार की ओर से एवम सम्पूर्ण जैन समाज द्वारका परिवार की ओर से ईशवर से प्रार्थना करता हूँ कि उन्हें शांति प्रदान करे और परिवार को इस दुःख एवम क्षति को हिम्मत और धेर्य के साथ सहने की शक्ति प्रदान करे |

Citizen's reporter
डॉ ० एम ० सी ० जैन 
राष्ट्रीय अध्यक्ष
राष्ट्रीय दिगम्बर जैन परिषद्(पंजीकृत) 

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