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Monday, January 30, 2017

हमारा वोट का अधिकार - एक फ़र्ज़ भी !

आर. डी. भारद्वाज " नूरपुरी "

जितनी मेहनत हम लोग एक रेहड़ी वाले से आलू , प्याज , टमाटर , हरी मिर्च या फिर धनियाँ इत्यादि चुनने और खरीदने में लगाते हैं , अगर हम इससे आधी मेहनत भी अपने नेता चुनने में लगाएं , चुनाव लड़ने वाले सभी नेताओं / प्रति प्रत्याशिओं के बारे में जानकारी हासिल करें , उनकी पुरानी कारगुजारियाँ की ध्यान से जाँच पड़ताल करें , उनका निरीक्षण करें , अदालतों में चल रहे उन पर मुकदमों का हिसाब किताब देखें , और यह कुच्छ करने के बाद ही विवेकशीलता से यह फैसला करें कि हमें अपना कीमती किसको वोट देना है , सबसे उत्तम कौन सा प्रत्याशी रहेगा , यह सब कुच्छ तह करने के बाद ही अपनी बेशकीमती वोट डालना सिनिश्चित करें , और लाज़मी तौर पे कम से काम ९० प्रतिशत वोट डालें , तो हमारे देश में मौजूदा प्रचलित लोकतंत्र प्रणाली में बहुत हद तक सुधार आ सकता है ! आम नागरिकों को मिलने वाली सुख / सहूलतें और सुविधाएं काफी हद तक बेहतर हो सकती हैं और हमारे गाँवों - २ , शहर - शहर में प्रस्थितियाँ बदल / सुधर सकती हैं !

मुझे यह बात इस लिए लिखनी पड़ रही है कि मात्र ढाई वर्ष पहले ही जब २०१४ में आम चुनाव हो रहे थे , उस दिन मैंने वोट डालने जाने के लिए अपने आस पास के 8 / 10 लोगों को कहा कि चलो वोट डालने चलते हैं , लेकिन लगभग सब ने ही जवाब दिया - "छोडो यार ! क्या करना है / इतनी गर्मी है / वहाँ जाकर हमें क्या मिलेगा / हमारा कौन सा कोई रिश्तेदार चुनाव रहा है ? वगैराह - २" ! सबने लगभग ऐसी ही प्रतिकिर्या देकर वोट डालने से पीछा छुड़वा लिया ! हालाँकि वोटिंग सेंटर हमारी कॉलोनी से केवल एक किलोमीटर से भी कम दूरी पर था ! इसका नतीजा यह हुआ कि हमारे चुनाव क्षेत्र में केवल ५३.४ % ही वोटिंग हुई , इसके बाद नागरिकों को मिलने वाली सुख सुविधायों / सहूलतों - जैसे कि पीने का साफ़ सुथरा पानी , बिजली , टूटी फूटी सड़कों की मुरम्मत , स्ट्रीट लाइट्स , पार्कों में घास लगाना , समय २ पर पानी देना, बच्चों के लिए झूले , पेड़ पौदे , कम्युनिटी सेन्टर , डिस्पेंसरी , पाठछालाएँ , नागरिकों की सुरक्षा (खास तौर पर महलायों के लिए ) , मार्किट इतयादि , और सड़कों की सफ़ाई और गलिओं से कूड़ा कचरा उठाना , वगैराह - न जाने कितने काम होते हैं , सभी कामों के न होने पर बाकी लोगों को , जोकि अपने वोट डालने के अधिकार का उपयोग करने के लिए एक दो किलोमीटर चलने का भी कष्ट नहीं उठा पाते , उन लोगों को बाद में शिकायतें करने या फिर चुने गए नेताओं गाली देने का भी कोई अधिकार नहीं रह जाता , क्योंकि जैसे वोटर अपने वोट डालने की जुम्मेवारी से कतराते रह गए हैं , इसके प्रति लापरवाही से काम लेते हैं , बिलकुल इसी प्रकार चुनाव जीतने के बाद नेता लोग भी अपने फ़र्ज़ के प्रति उदासीन या फिर असंवेंदनशील हो जाते हैं , लोगों की जरूरतों की उन्हें भी कोई चिन्ता या सचेतता और संवेदना नहीं रहती है ! इस मामले में दोनों में कोई खास अन्तर नहीं है ! न जाने लोग क्यों और कैसे भूल जाते हैं कि वोट डालना यहाँ एक अधिकार है , वहीं पर यह हमारी एक लोकतान्त्रिक जिम्मेदारी भी बनती है, हमारा एक बेहद जरुरी फर्ज़ भी है ! 

कृपया याद रखें - एक बहुत बड़े राजनैतिक चिन्तक व विश्लेशिक ( टॉमस जेफ़रसन ) ने बहुत वर्ष पहले लोकतंत्र की सफलता के बारे में एक बहुत ही सटीक बात कही थी - "हमारी निरन्तर सजगता ही लोकतंतर की सफलता की गारन्टी है !" यहाँ वोट डालने में हमने अपने फ़र्ज़ के प्रति थोड़ी सी भी लापरवाही बरती , वहीं पर नेताओं ने पूरे देश और समाज के प्रति अपनी जिम्मेवारियाँ भी भूल जानी हैं और देश को लूटना शुरू कर देना कर देना है । बाद में वहाँ की जनता चाहे कितना भी रोती कुरलाती या शोर मचाती रहे ! क्योंकि हमारे देश में चुनाव हो जाने बाद अगर ऐसा पता चले कि जिस नेता को लोगों इतने भारी बहुमत से जिताया है , और वह नेता बाद जनता की कोई खबरसार तो लेता ही नहीं , तो ऐसे नेता को वापिस बुलाने का अधिकार तो देश की जनता के पास है ही नहीं ! दूसरी बात , सोई हुई जनता को लूटना और खुले पड़े ख़ज़ाने में सेँध लगाना तो बहुत ही सरल काम होता है ! अब यह फैसला भी आपने ही करना है कि निरन्तर सजग और सचेत रह कर अपने अधिकारों की रक्षा करनी है और अपनी बनने वाली सुख / सुविधाएँ / सहूलतें प्राप्त करनी हैं या फिर पल दो पल या फिर हफ्ते दस दिन के सुख की ख़ातिर (जैसे कि कुच्छ लोग चुनाव के दिनों में दारु की एक दो बोतल लेकर / एक आधी साड़ी या फिर कम्बल लेकर किसी गलत नेता को वोट डाल देते हैं , और बाद में पाँच वर्ष तक अपनी किस्मत को / अपने समाज को और अपने देश को भी कोसते रहते हैं ) ! लोगों को यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि वोट लेने की खातिर जो नेता या पार्टी आपको ऐसे प्रलोभन दे रहे हैं , दरअसल वह आपको रिश्वत देकर यह कह रहे है हैं कि आप उनकी पिछली ग़लत किस्म की कारगुजारियों को भूल जाएँ । अब आप ही बताएँ , क्या रिश्वत लेना और देना सही काम है ? यह रिश्वत देने वाले ही जीतने के बाद बड़े २ घोटाले करते हैं और जनता अपने को मिलने वाली कल्याणकारी योजनाओं से वन्चित रह जाते हैं । क्या ऐसे होगा देश और समाज का विकास ? जागो इंडिया , जागो ! अपना फ़र्ज़ पहचानो और अच्छी तरह सोच विचार करके ही, सजग रहते हुए अपने वोट के अधिकार का प्रयोग करो , ना कि आलसी बनके अपनी ही धुन में पड़े रहो ! आपका और आपके बच्चों का भविष्य काफ़ी हद तक आपके अपने हाथ में ही है ! जिस दिन आप यह बात समझ जाओगे , उस दिन से आपकी ज़िन्दगी में सुधार आना शुरू जायेगा ! और फ़िर , हमारे यहाँ तो वोट डालने के लिए पूरी छुट्टी भी मिलती है ? तो वोट डालने से क्यों कतराते हो ? 

एक और खास बात बतानी भी यहाँ पर अत्यन्त आवश्यक हो जाती है - वोह यह कि एक टीवी चैनल की रिपोर्ट की अनुसार कुच्छ राज्यों का भारतीय रिज़र्व बैंक के प्रति एक दो लाख करोड़ से भी ज़्यादा कर्जा है । माना कि सरकार को / हमारे नेताओं को प्रदेश की जनता के कल्याण के लिए अनेक सरकारी योजनाएँ बनानी होती हैं और उन्हें लागू करने लिए बड़ी २ धन राशि की आवश्यकता पड़ती रहती है , जिसके लिए कभी २ आरबीआई से करोडों रूपये का कर्जा भी लेना पड़ जाता है । लेकिन इतने लाखों रूपये के कर्जे के बावजूद भी उस प्रदेश की वह सरकारी योजनाएँ पूरी क्यों नहीं होतीं , प्रदेश की जनता के लिए कोई ढंग के कल्याणकारी कामकाज ना हुए हों , प्रदेश के पढ़े लिखे नौजवान भी नौकरियों के लिए मारे २ फ़िरते हों , महँगाई से जनता खासी परेशान रहती हो , तो मामला कुच्छ जरुरत से ज़्यादा ही गम्भीर रूप ले लेता है । बड़े २ कर्जों की वह धन राशि आख़िर जाती कहाँ हैं ? इसका मतलब यह निकलता है कि उस प्रदेश की सरकार चलाने वाले नेता लोग या तो अपने काम में सक्षम नहीं है और या फ़िर उनके काम करने के तरीके ग़लत हैं , उनकी नियत में कोई गहरी खोट है । हर तरफ़ से जनता का मंदा हाल , तो फिर यह नेता कैसे हो जाते हैं मालामाल ? ज़रा ठन्डे दिमाग़ से और गंभीरता से सोचने और समझने की जरुरत है । अपने ही प्रदेश की जनता से वसूले गए अनेक प्रकार के करों पर ऐश-प्रस्ति करने वाले नेता लोग सरकारी ख़जाने से इतनी सुख सुविधाएँ कैसे भोग लेते हैं ? इनकी इतनी मोटी और असंवेदनशील सोच विचार कैसे बन जाती है ? प्रत्त्येक पार्टी के अनेकों नेताओं में पार्टी की टिकेट के लिए इतनी मारा मारी यही सत्ता प्राप्त करने और इसकी वजह से मिलने वाली सैकड़ों प्रकार की सुख सुविधाएँ भोगने के लिए ही और करोड़ों रूपये हथ्याने के लिए ही तो होड़ लगी रहती है , ना कि देश जनता की भलाई के लिए ? 

इस लिए मेरा मानना है कि ऐसे नेताओं की नीयत में खोट है और सरकारी कामकाज के सिलसिले में थोड़ा परिवर्तन करके एक ऐसा प्रावधान भी बनाना चाहिए कि अगर किसी छोटे राज्य / प्रदेश पर आरबीआई का बीस-पचीस हजार करोड़ और बड़े प्रदेश का तीस-पैंतीस हज़ार करोड़ रूपये से अगर कर्ज ज़्यादा है तो उस प्रदेश के सभी मंत्रियों और एमएलए और काउंसिलरों को उपलब्ध होने वाली तनखाह , उनको दिए जाने वाले सभी सुख सहूलतें और भतों में तब तक ५० % की कटौती जारी रहनी चाहिए , जब तक उस प्रदेश का कर्जा ऊपर दी गई सीमा के भीतर ना आ जाये । प्रदेश को इतने बड़े २ कर्जे में डुबोकर जाने वाले मंत्रियों पर क़ानूनी कार्यवाही भी होनी चाहिए । दूसरी बात - अभी पाँच प्रदेशों में अगले महीने चुनाव होने वाले हैं , और अगर वहाँ की किसी सरकार पर इस सीमा से ज़्यादा कर्जा है , जो वहाँ की जनता को चाहिए कि वहाँ ऐसे नेताओं को अपने वोट के अधिकार से बदल डालें , क्योंकि ऐसे नेता सरकार चलाने में हरगिज सक्षम नहीं हैं , बल्कि यह लोग केवल और केवल वहाँ की जनता के ऊपर एक बोझ से ज़्यादा कुच्छ भी नहीं है । अभी भी समय है , जागो ! इंडिया , जागो । अगर समय रहते उन प्रदेशों के वोटर नहीं सम्भले और उन्होंने अच्छी तरह सोच विचार करके अपना कीमती वोट नहीं डाला , तो अगले पाँच वर्ष के लिए आपको फिर से पश्ताना पड़ जायेगा और फिर सिवाए पश्तावे के आपको कुच्छ भी हासिल नहीं होने वाला ! और एक और तीसरी बात , जो नेता लोग धर्म के नाम पर , जात बरादरी के नाम पर , मन्दिर - मस्जिद के नाम पर, गौअ रक्षा के नाम पर या फिर दारू की बोतलें बाँट कर , महिलायों को सूट - साड़ियाँ या फिर प्रेशर कुकर देकर वोट के लिए जोर देते हैं , ऐसे नेताओं से आप लोग जितना दूर रहोगे उतना ही आपके लिए और आपके प्रदेश के चौतरफ़ा विकास , सुख समृद्धि के लिए अच्छा होगा । इन सब वस्तुओं का लालच देकर वोट मांगने वालों से कहो कि हमें भीख़ नहीं चाहिए , बल्कि नौकरियाँ ही चाहिए , नौकरी मिल जाये तो यह सब सुख देने वाले भौतिक पदार्थ हम खुद ही ख़रीद लेंगे । एक और बात - ना जाने कितने ऐसे नेता लोग चुनाव लड़ रहे हैं जिन पर क़त्ल , फिरौती माँगने , बलात्कार , ठगियों / घोटाले और तरह २ की हिंसात्मिक गतिविधियोँ में सम्लित होने और करवाने के मुकदमें अदालतों में चल रहे हैं ? क्या ऐसे लोगों का राजनीति में आना और सत्ता सुख भोगना हमारे समाज के लिए अच्छ साबित हो सकता है ? बिलकुल भी नहीं ! बाकी फ़ैसला आपके अपने हाथ में है , कि आप अपना विकास चाहते हो या फिर कुच्छ और ? जो लोग समय रहते अपनी सोच और क्रिया नहीं बदलेंगे , उनको बाद में बहुत पछताना पड़ेगा !!!

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