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Saturday, October 22, 2016

मृत्यु एक अटल सच्चाई !

आर. डी. भारद्वाज "नूरपुरी"

ऋषि वेद व्यास वैदिक काल के महान ऋषियों-मुनियों और संत महात्माओं में से एक थे। वेद व्यास जी महाभारत ग्रंथ के रचयिता तो थे ही, साथ ही साथ वह उस काल की बहुत सी घटनाओं के साक्षी भी रहे हैं, जिन्होंने बाद में युग परिवर्तन किया, धर्म की स्थापना में उनका बड़ा महत्वपूर्ण योगदान भी रहा है ! मुनि वेद व्यास जी धार्मिक ग्रंथों एवं वेदों के एक महान ज्ञाता थे और एक महान विद्वान भी थे, उनकी विध्वता द्वारा ही महाभारत जैसे उच्चकोटि के ग्रंथ की रचना संभव हो पाई। यही नहीं, उन्होंने ने ही अट्ठारह पुराणों की भी रचना की थी । पौराणिक युग की महान विभूति तथा साहित्य-दर्शन के प्रणेता वेद व्यास जी का जन्म आज से लगभग 5250 वर्ष पूर्व हुआ था।

ऋषि वेद व्यास जी के विषय में पौराणिक ग्रंथों में अनेक तथ्य प्राप्त होते हैं, कुछ विद्वान तो उन्हें भगवान विष्णु का अवतार भी मानते हैं । उनकी माता का नाम सत्यवती और उनके पिता ऋषि पराशर थे । सत्यवती, मत्स्यगंधा नाम से भी प्रसिद्ध हुई थी । सत्यवती के पिता दाशराज एक नाविक का काम करते थे, और इसके साथ - २ ही वह यमुना नदी से मछलियाँ पकड़ कर उन्हें बेच कर अपने परिवार का भरण-पोषण किया करते थे। सत्यवती बचपन से ही अपने पिता के साथ उनके इस काम में सहयोग देती थी। कहते हैं कि नदी से अनेक वर्षों तक लगातार मछली पकड़ने और बेचने के काम करने की वजह से सत्यवती के शरीर से मछली की दुर्गन्ध आती थी, और इसके कारण ही उनका नाम मत्स्यगंधा भी पड़ गया था। ऋषि पराशर से उनकी पहली मुलाकात उनको नदी पार करवाने के सिलसिले में ही हुई थी । ऋषि पराशर सत्यवती के रूप, यौवन और सौंदर्य पर इस कदर मोहित हो गए थे कि उन्होंने वहीँ पर सत्यवती से प्रेम प्रसंग का इज़हार कर दिया और उनसे मधुर सम्बन्ध बना लिए । इसके बाद ऋषि मुनि व ब्रह्मज्ञानी पराशर ने अपनी योग विद्या के बल से सत्यवती के शरीर से आने वाली मछली की दुर्गन्ध को सुगन्ध में परिवर्तित कर दिया।

ऋषि वेद व्यास जी बचपन से ही वेद वेदांगों में पारंगत हो गए थे और उन्होंने अपनी माता सत्यवती से यह कहकर अलविदा ले ली, कि आप जब भी कभी मुझे स्मरण करेंगी, मैं आपकी सेवा में उपस्थित हो जाऊँगा, यह कह कर वह बालक वेद व्यास तपस्या करने के लिये चले गए। व्यास जी सांवले रंग के थे जिस कारण इन्हें कृष्ण भी कहा गया है। यह भी सुनने में आता है कि पहले वेद चार नहीं, बल्कि एक ही बहुत बड़ा ग्रन्थ था । और इतने बड़े ग्रन्थ को हर कोई पढ़ने और अध्ययन करने की हिम्मत नहीं जुटा पाता था । फिर कुछ और साधु-सन्तों व महात्माओं ने व्यास जी की विद्वत्ता और विवेकशीलता को देखते हुए इनको इस इतने बड़े ग्रन्थ को किसी बढ़िया तरीके से श्रेणीबद्व करने के लिए निवेदन किया था, तब व्यास जी ने इस विशाल ग्रन्थ को चार भागों में विस्तार और विभाजन करके इसको चार ग्रंथो ( ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद ) में बाँट दिया था, और उनके इसी महान कार्य को सफलता पूर्वक अन्जाम देने के कारण ही वह बाद में वेद व्यास के नाम से विख्यात हुए । महाभारत को हिन्दु धर्म में पाँचवां ग्रन्थ माना गया है । कुछ विद्वान तो उन्हें भगवान विष्णु के अवतार के रूप में भी मानते हैं ।

वेद व्यास जी महान महाभारत ग्रंथ के रचियता तो थे ही, साथ ही साथ वह महाभारत की विभिन्न घटनाओं के प्रत्यक्षदर्शी ओर साक्षी भी थे । वेद व्यास जी योग शक्तिसम्पन्न और त्रिकालदर्शी ऋषि थे । बाद में जब सत्यवती ने राजा शान्तनु से शादी की, तो उनको दो पुत्र प्राप्त हुए - जिनके नाम थे - चित्रांगद और विचित्रवीर्य। बड़ा बेटा चित्रांगद तो युद्ध भूमि में मारा गया और छोटा बेटा विचित्रवीर्य संतानहीन ही मर गया । तब अपने कुल की रक्षा के लिए और वंश को आगे बढ़ाने के लिए सत्यवती ने, अपने बड़े बेटे भीष्म को भेजकर, अपने दूसरे पुत्र वेद व्यास को बुलवाया, और इस तरह अपनी माता के आग्रह पर विचित्रवीर्य की दोनों रानियों (अम्बिका और अम्बालिका) को उन्होंने नियोग के नियम का सहारा लेकर, दो पुत्रों की प्राप्ति करवाई, जो धृतराष्ट्र तथा पाण्डु कहलाये, और तीसरे दासी पुत्र विदुर थे, जो कि बहुत बड़े विद्वान और राजनीति और धर्म शास्त्र में निपुण थे । यही नहीं, वेद व्यास जी ने महाभारत के युद्ध के दौरान धृतराष्ट्र के आग्रह करने पर संजय को दिव्य दृष्टि भी प्रदान कर की, जिसकी सहायता से वह महाभारत का युद्ध-दर्शन कर पाए और राजा धृ्तराष्ट्र को उसका वर्णन एक प्रत्यक्ष दर्शी की तरह सुना सके ।

क्योंकि दाशराज जी की इकलोती बेटी सत्यवती की शादी उस वक़्त के सबसे ताकतवर राजे शांतनु से हो चुकी थी और वह अपने ज़माने के सबसे समृद्ध और विशाल साम्राज्य - हस्तिनापुर की पटरानी बन चुकी थीं, तो दाशराज अपनी दुनियां में बेहद खुश थे और उनको महसूस हो रहा था कि अब तो बस ज़िन्दगी गुलज़ार है । वैसे भी दशराज जी एक अत्यन्त ही महत्वकांक्षी किस्म के व्यक्ति थे, यही तो एक बहुत बड़ा कारण था कि जब राजा शांतनु ने उनके समक्ष सत्यवती के साथ विवाह का प्रस्ताव रखा, और दोनों परिवारों के बीच इतनी बड़ी असमानता होने के बावजूद भी दाशराज ने अपनी तरफ़ से यह शर्त रख दी कि पहले आप यह वचन दो कि उनके बाद सत्यवती का पुत्र ही उनका उत्तराधिकारी बनेगा | कहते हैं कि एक बार वेद व्यास जी अपने नहिहाल अपने नाना, दाशराज जी को मिलने गए हुए थे, तो दाशराज जी ने अपने नाती वेद व्यास जी के सामने अपनी एक इच्छा प्रकट की - दरअसल, दाशराज जी का मानना था कि यह दुनियां बड़ी सुन्दर है, उनको यहाँ पर किसी किस्म का भी कोई कष्ट नहीं है, सब तरह की सुख सुविधाएं उनके पास उपलब्ध हैं, इस लिए वे चाहते थे कि वे कई हजार वर्षों तक जीवित रहें और मृत्यु उनके नज़दीक भी न फटक सके ।

वेद व्यास जी ने उनको समझाने की बहुत कोशिश की कि उनकी यह इच्छा पूर्ण होना संभव नहीं है, क्योंकि परमपिता परमात्मा ने सृष्टि बनाते समय यह भी एक अटल नियम बनाया है कि जिस भी प्राणी का जन्म हुआ है, उसकी मृत्यु भी निश्चित है । यहाँ तक कि भगवान राम, गुरु विशिष्ट जी, ऋषि बाल्मीकि जी, ऋषि यमदग्नि जी, वामन जी, ऋषि विश्वामित्र जी या फिर भगत प्रह्लाद जी - न जाने कितने बड़े - 2 संत महात्मा, ऋषि-मुनि, तपस्वी, पीर, पैगम्बर भी इस पृथ्वी पर आए, लेकिन इन सब में से कोई भी हमेशा के लिए नहीं आये थे । उनको भी अपनी लिखी हुई उम्र भोगने के बाद इस पृथ्वीलोक को त्यागकर मृत्यु लोक जाना ही पड़ा था। ब्रहमा जी की बनाई हुई सृष्टि तो मात्र एक नाटक ही है और इस नाटक का यह शाश्वत नियम है, कि जिस भी जीव का जन्म होता है, उसका अपनी जीवन लीला समाप्त करके मृत्यु लोक को प्राप्त होना भी उतना ही अनिवार्य है । लेकिन व्यास जी के नाना दाशराज जी तो कोई बात मानने को तैयार ही नहीं थे। दाशराज जी तो बार - 2 एक ही बात पर बार २ ज़ोर दिए जा रहे थे, कि उनका नाती वेद व्यास एक बहुत बड़ा ऋषि-मुनि है, वेदों ग्रथों का विद्वान है, एक बहुत बड़ा तपस्वी है, उसके पास तो बहुत बड़ी - 2 अपार और अचूक शक्तियाँ भी हैं, तो इन सबके होते हुए वेद व्यास के लिए अपने नाना के लिए यह कार्य करना बहुत ही आसान काम है । दूसरी तरफ वेद व्यास जी के लाख समझाने पर भी जब उनके नाना अपनी ज़िद पर टिके ही रहे, तो आखिर में व्यास जी ने उनको कहा कि मैं आपके लिए बस इतना ही कर सकता हूँ कि आप मेरे साथ चलिए, मैं आपको सृष्टि रचयिता परमपिता ब्रह्मा जी के पास ले जाऊँगा, आप खुद ही उनके सामने अपनी इच्छा रख देना और फिर जो वह कहेंगे, वही आप मान लेना ।

तो इस तरह वेद व्यास जी उनको ब्रह्मा जी के पास ले गए । वहाँ पहुँचने के बाद व्यास जी ने उनका परिचय करवाया और ब्रह्मा जी से निवेदन किया कि आप इनकी बिनती सुन लीजिये और अगर हो सके तो इस पर कोई सकारात्मक कार्यवाई भी करें । दाशराज जी की बात सुनकर ब्रह्मा जी ने उनको समझाने का भी प्रयत्न किया कि आपकी यह इच्छा विधि के विधान के बिलकुल विपरीत है, अथवा यह कदापि स्वीकार्य नहीं है। लेकिन दाशराज जी कहाँ मानने वाले थे ? जब उन्होंने अपनी जिद नहीं छोड़ी, तो ब्रह्मा जी ने यह कहकर अपना पल्ला झाड़ लिया कि आपकी यह माँग तो वैसे भी मेरे अधिकार क्षेत्र से बाहर है, क्योंकि मेरा कार्य तो सभी प्रकार के जीवों की उत्पति करना ही हैं, किसी के प्राण लेना मेरे अधिकार में नहीं है । अतः आप विष्णु जी के पास चले जाइए और उनके सामने ही अपनी विनती रखिये ।

उसके बाद, वेद व्यास जी अपने नाना को विष्णु जी के पास ले गए और वहाँ जाकर भी उन्होंने अपने नाना की समस्या विष्णु जी के समक्ष रखी । विष्णु जी भी उनकी यह अजीबो-गरीब ख्वाहिश सुनकर हैरान रह गए और बोले कि - जब से यह सृष्टि की रचना हुई है, इस पृथ्वी पर हज़ारों - लाखों साधु संत, ऋषि-मुनि और तपस्वी आये है, और उनमें से किसी ने भी आजतक ऐसी कोई ख्वाहिश नहीं रखी। परमपिता परमात्मा द्वारा दिए गए उनके स्वासों की पूँजी जब समाप्त हो गई, तो वे सभी प्राणी इस पृथ्वी लोक को त्याग कर मृत्यु लोक चले गए । कोई भी यहाँ हमेशा रहने के लिए नहीं ठहरा । अपना - २ समय आने पर सभी लोग मृत्यु को प्राप्त हो गए। यही इन्सानी जिंदगी की एक अत्यन्त कड़वी और अटल सच्चाई है और इसे आपको भी मानना पड़ेगा, क्योंकि समस्त सृष्टि का यही नियम है । जब फिर भी वेद व्यास के नाना नहीं माने, तो विष्णु जी ने वेद व्यास जी का लिहाज करते हुए उनको कह दिया, "इससे ज्यादा मैं आपके लिए कुछ नहीं कर सकता, वैसे भी मेरा काम तो सभी प्राणियों का जब तक जीवन है, उनको अन्न जल उपलब्ध करवाना है, जीवन लीला पूरी होने के बाद उनके प्राण हरना तो महेश जी, अर्थात शिव जी के अधिकार क्षेत्र में है । आप उनके पास चले जाइए और वही आपको बताएँगे कि आपकी इच्छा पूर्ति हो सकती है या नहीं !"

इसके बाद भी जब दाशराज जी अपनी इच्छा पर टिके रहे तो वेद व्यास जी उनको शिव जी के पास ले गये । वहाँ जाकर भी वेद व्यास जी ने महेश जी के सामने अपने नाना की अभिलाषा पेश की । पहले तो शिव जी भी उनकी यह हास्यास्पद सी इच्छा सुनकर परेशान हो गए और फिर उन्होंने भी दाशराज को अपने तरीके से समझाने का पुरज़ोर यत्न किया। लेकिन दाशराज थे कि बस अपनी जिद पर एक हठी बालक की तरह जैसे के वैसे ही बने रहे । तब शिव जी ने कहा, "चलो ! पहले यह तो देख लें कि इनकी असल में ब्रह्मा जी ने उम्र लिखी कितनी है ! दूसरी बात ! इसके लिए तो हमने यमराज को नियुक्त्त किया हुआ है, वही आपको बताएँगे, कि आपकी असल में स्वासों की पूँजी है कितनी?" यह कहकर उन्होंने यमराज को याद किया और यमराज तुरन्त उपस्थित हो गए। शिव जी ने यमराज को दाशराज जी की उम्र के बारे में पूछा और कहा कि यह भी बताओ कि इनकी मृत्यु कब, कहाँ और कैसे होनी, ब्रह्मा जी ने लिखी है ? सुनकर यमराज ने अपने सेवक / सहायक चित्रगुप्त को याद किया और उससे माँगी गई पूरी जानकारी देने के लिए कहा । सुनकर चित्रगुप्त अपनी वही-खाते ले आए और देखकर बोले, "प्रभु ! दाशराज की मृत्यु तो बस होने ही वाली है और इनकी मृत्यु के बारे में परमपिता ब्रह्मा जी ने बिलकुल साफ़ २ लिखा है कि दाशराज जी जब खुद चलकर यमराज के पास आएँगे, तो इनकी मृत्यु हो जाएगी !" अपनी मृत्यु के बारे में सम्पूर्ण सत्य और जगह के बारे में जानने पर, दाशराज जी सुन्न हो गए, उनकी बुद्धि, विवेक, सब तरह के छल, चालाकी होशियारी समाप्त हो गई और वह वहाँ खड़े - २ कभी अपने नाती वेद व्यास जी को देखते, और कभी शिव जी को, कभी यमराज को और कभी उनके सहायक चित्रगुप्त को देखते, जिन्होंने अभी - २ उनकी मृत्यु के बारे में विस्तार से सबके सामने बताया था । उनको समझ नहीं आ रहा था कि अब अगली चाल वह क्या चलें और उसके बारे में किस से कहें । और फिर अचानक उनका सिर चकराने लग गया और वह बेहोश होकर वहीँ गिर गए और मृत्यु लोक को प्राप्त हो गए ।

तो इस प्रकार ब्रह्मा जी किसी भी प्राणी के जन्म से पहले ही उसकी पूरी जिन्दगी की घटनाएँ तो लिख ही देते हैं, साथ ही साथ उस प्राणी की मृत्यु कब, कहाँ और कैसे आनी है, इसका पूर्ण सत्य भी उस प्राणी के जन्म के पहले ही लिख दिया जाता है और उसमें किसी भी तरह का कोई भी हेर फेर नहीं हो सकता । और फिर, मौत का फरिश्ता यमराज ना तो किसी से किस्म की कोई रिशवत लेते हैं और ना ही वह किसी के कोई रिश्तेदार हैं । यहाँ तक क़ि प्राणी खुद ही चलकर अपनी मृत्यु वाली जगह पर, सही वक़्त आने पर पहुँच जाता है, या फिर यह भी कह सकते हैं कि मृत्यु प्राणी को उसके घटित होने वाले स्थान पर अपने आप ही खींच कर ले आती है और फिर बाकी का कार्य तो यमराज स्वमं ही कर देते हैं, जैसा कि दाशराज जी बारे में सिद्ध हो गया ।

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