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Thursday, September 22, 2016

सेतु समुद्रम परियोजना राष्ट्रहित में है


आर. डी. भारद्वाज "नूरपुरी"

राम सेतु या सेतुसमुद्रम बनाम आदम सेतु परियोजना पिछले कई वर्षों से एक विवाद का मुद्दा बनी हुई है, जिसके कारण अभी तक यह सुलझाने के कगार पर आने से पहले ही और भी उलझती जा रही है । या फिर यह कहना शायद ज्यादा उचित होगा कि श्री राम से जुड़े एक और मुद्दे / विवाद की तरह ही इसे भी जितने प्रयास सुलझाने के लिए किये जाने चाहिए थे, उससे ज्यादा इस को उलझने में ताकत लगा दी जाती है, क्योंकि कुछ तंगदिली वाले लोगों के दिलो दिमाग में राजनीति इस कदर छाई हुई है कि उन्हें कुछ मुद्दे राष्ट्रहित से भी बड़े नज़र आते हैं । तो आइए ! पहले यह जानने का प्रयास करते हैं कि आख़िरकार रामसेतु बनाम श्रीराम सेतु समुद्रम परियोजना हकीकत में है क्या ?

हिन्द महासागर में मन्नार की खाड़ी से बंगाल की खाड़ी की ओर आने-जाने के समुद्री जहाजों को बहुत लम्बा रास्ता तय करना पड़ता है, जो कि लगभग 650 नॉटिकल मील है । इसका कारण है कि इन समुद्री जहाजों को भारत और श्रीलंका के बीच का एक छोटा रास्ता जो कि केवल 167 नॉटिकल मील ही है, को छोड़कर श्रीलंका का पूरा चक्कर लगाकर आना-जाना पड़ता है । वजह - अरब सागर की खाड़ी में हिंदुस्तान और श्रीलंका के बीच समुद्र के कुछ हिस्सों में पानी बहुत उथला है, जिसके कारण वहां पर समुद्र की सतह वाली चट्टानों से जहाजों के टकराकर क्षतिग्रहस्त होने / नष्ट होने का खतरा बना रहता है, क्योंकि समुद्री जहाज की कीमत कई सौ करोड़ रूपये होती है और साथ ही उसमें जानमाल का भी खतरा रहता है । अतः हिन्द महासागर के उस खास जगह से गुजरने का जोख़िम उठाना किसी भी नज़रिये से उचित प्रतीत नहीं होता ।

ऐसा माना जाता है कि आदिकाल में जब श्रीराम की पत्नी सीता जी को लंका का राजा रावण अपहरण करके ले गया था और उसका पता चलने पर बार-बार उसे समझाने पर भी जब रावण सीता जी को सम्मान सहित वापिस लौटाने के लिए तैयार नहीं हुआ, तब उसके साथ युद्ध होना निश्चित हो गया था । सो इस तरह रामेश्वरम से तलाई रमन (श्रीलंका) जाने के लिए श्रीराम ने अपने सहयोगियों, मित्रों व वानर सेना की सहायता से धनुषकोटि (दक्षिण भारत में अंतिम तटिया छोर ) और तलाई मन्नार (श्रीलंका) के बीच समुद्र पर एक सेतु बनवाया था, जो कि बाद में रामसेतु के नाम से प्रसिद्ध हो गया । इस सेतु की लम्बाई लगभग 32 किलोमीटर थी और इसके होने की सच्चाई तो अमरीका की एक बड़ी एजेंसी - नेशनल एयरोनॉटिक्स एण्ड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन (नासा) कोलम्बिया, ने भी अपने उपगृह के जरिए खींची गई समुन्दर की तस्वीरों से प्रमाणित कर दी है ! श्रीराम के बाद इसके इस्तेमाल किये जाने का कोई प्रमाण हमारे धार्मिक ग्रथों / या इतिहास में नहीं मिलता । लगता है, हजारों वर्ष बीत जाने के बाद यह प्राचीन सेतु रख-रखाव के अभाव के कारण या फिर अपनी समय सीमा पूरी होने के बाद, यह सेतु अपने आप ही ढह गया और अब इस सेतु का मलबा वहीं पर समुद्र की सतह पर पड़ा है, जिसके कारण उन चंद एक किलोमीटर में समुद्र की गहराई इतनी कम हो गई है कि वहां से छोटे समुद्री जहाज़ तो निकल जाते हैं, लेकिन बड़े जहाजों का वहां से सही सलामत गुजरना नामुमकिन सा हो गया है । लेकिन, समुद्री रास्ते से आवाजाही का काम तो रोका नहीं जा सकता, भले ही जहाजों को किसी और लम्बे रास्ते से ही क्यों न आना-जाना पड़े । इस तरह मन्नार की खाड़ी से बंगाल की खाड़ी की ओर जाने के लिए समुद्री जहाजों को श्रीलंका का पूरा चक्कर लगाकर ही आना पड़ता है, उसमें लगभग 650 नॉटिकल मील का एक लम्बा सफ़र तय करने में लगभग 36 घण्टे का समय लगता है, जिसकी वजह से जहाजों के परिचालन के लिए हजारों गैलन डीज़ल अतिरिक्त खर्च तो होता ही है, और साथ-ही-साथ बहुत ज्यादा समय भी बर्बाद होता है ।

अतः राजनैतिक स्तर पर इस मसले को सुलझाने के लिए समय पर कई बार प्रयास किये गए और बहुत सी योजनाएं भी बनाई गई, ताकि इस लम्बे रास्ते से छुटकारा मिल सके और परिचालन खर्चे में भी कटौती लाई जा सके । अन्तिम सरकारी परियोजना जिसके अन्तर्गत अभी काम शुरू होने वाला था, उसके अधीन समुद्र के बीचों-बीच एक ऐसी नहर खोदने की योजना थी - जिसमें बड़े-बड़े समुद्री जहाजों की भी आवाजाही आसानी से हो सके । इस 12 मीटर गहरी और 300 मीटर चौड़ी नहर की लम्बाई 167 किलोमीटर होगी, जिसकी अनुमानित लागत लगभग 5,000 करोड़ रूपये आएगी । इस परियोजना के मुकम्मिल हो जाने पर समुद्री यात्रा का समय 36 घंटों से घट कर मात्र 11-12 घंटे ही रह जाएंगे । चूँकि इस परियोजना को पूरा करने के लिए समुद्री सतह पर पड़े श्रीराम द्वारा निर्मित पुल के मलबे के कुछ हिस्से को वहाँ से हटाया जाना भी शामिल है, अत: एक राजनीतिक पार्टी और कुच्छ दल इस परियोजना का शुरू से ही विरोध कर रहे हैं । उनका कहना है कि किसी भी रूप में वहाँ से रामसेतु के मलबे को उठाने नहीं दिया जायेगा, क्योंकि यह उनकी श्रीराम के प्रति श्रद्धा व आस्था का सवाल है ।
यहाँ पर एक बात इस देश में रहने वाले किसी भी नागरिक को नहीं भूलनी चाहिए कि "कोई भी व्याक्ति चाहे वह कितना भी बड़ा क्यों न हो, वह अपने गाँव से छोटा ही होता है, गाँव उससे हमेशा बड़ा ही रहेगा, गाँव से बड़ा वह जिला होता है जिसमें वह गाँव आता है, ज़िले से बड़ा प्रदेश होता है, और सबसे बड़ा देश होता है । सो, देश के हित में इसकी रक्षा व सुरक्षा के लिए या फिर मानव कल्याण के लिए किये जाने वाले सभी काम सर्वोपरि होते हैं अर्थात्, वरीयता की दृष्टि से उसे सबसे ऊपर स्थान दिया जाना चाहिए । वैसे भी, पूरी दुनिया का इतिहास गवाह है कि उन देशों ने बहुत तीव्र गति से प्रगति, विकास व समृद्धि प्राप्त की है, जिनके नेताओं ने अपने छोटे-मोटे राजनैतिक नफ़े - नुकसान से ऊपर उठकर राष्ट्र हित में सोचा और वह राष्ट्र हित साधने के लिए उन्होंने पूरी लगन और निःस्वार्थ से मेहनत की और इस रस्ते में आने वाली सब किस्म की अड़चनों को रस्ते से बिलकुल हटा ही दिया, ताकि अपना बड़ा लक्ष्य हासिल किया जा सके !

जहाँ तक श्रीराम की वास्तविकता का सवाल है, मैं समझता हूँ की दक्षिण भारत के 2/3 प्रदेशों को छोड़कर पूरे हिन्दुस्तान में बहुत काम ऐसे परिवार या व्यक्त्ति होंगे जो उनके जीवन से जुडी हुई अनेक घटनाओं को सन्देह की दृष्टि से देखते होंगे । दूसरी बात यह भी किसी को नहीं भूलनी चाहिए कि हिन्द महासागर में सेतु समुद्रम परियोजना पूरी हो जाने के बाद श्रीराम के प्रति हमारी आस्था या निष्ठा समाप्त नहीं हो जाएगी, और न ही उसमें कोई कमी आएगी, बल्कि जब यह सेतु परियोजना पूरी हो जाएगी, लोगों का विश्वास श्रीराम के प्रति और भी गहरा हो जायेगा, क्योंकि उन्होंने सदियों पहले मानवता को ऐसा अनूठा उदाहरण प्रस्तुत किया था जोकि धरती तो क्या, आदमी अगर चाहे तो वह अपनी मेहनत और लगन से समुद्र की दूरियों को भी नज़दीकियों में तब्दील कर सकता है, और कठिन-से-कठिन परिस्थितियों से जूझते हए अपना मनोरथ सिद्ध कर सकता है । वैसे भी इतिहास ऐसे बेहिसाब उदाहरणों से भरा पड़ा है कि जब भी जरुरत पैदा हुई, मानव ने अपना लक्ष्य प्राप्त करने के लिए पहाड़ों, नदियों, जँगलों व समुद्रों को भी चीरकर अपना रास्ता बनाया है, अपने मनोरथ सिद्ध किये हैं। हमारे ही पडोसी देश चीन ने शायद दुनिया का सबसे लम्बा (लगभग 27 किलोमीटर) समुन्दर पर फलाई-ओवर बना लिया है। यही नहीं, चीन ने तो हिमालया पर्बत पर सड़क और रेल मार्ग भी बनाकर हमारे देश के लिए सामरिक दृष्टि से एक बहुत बड़ी चुनौती / परेशानी खड़ी कर दी है। और हमारे देश के नेतागण अभी भी घटिया किस्म की राजनीति करने में मशगूल रहते हैं, भले ही उसमें पूरे देश को कितनी भी हानि क्यों न उठानी पड़े ! यही कारण है कि विपरीत परस्थितियों के बावजूद भी सेतु समुन्दर परियोजना पर इतना बवाल मचाया जा रहा है? यह बवाल मचाने वाले राजनैतिक पार्टियों व दलों को जरा गौर से अपने भीतर झांकना चाहिए और थोड़ा आत्म-विश्लेषण भी करना चाहिए कि - क्या उनका इस योजना का विरोध असलियत में कहीं राष्ट्र विरोधी तो नहीं?

यह रामसेतु परियोजना पूरी हो जाने के बाद बंगाल की खाड़ी से अरब सागर सीधा संपर्क स्थापित हो जायेगा, जिससे 254 से 424 नॉटिकल मील का फ़ासला कम हो जाएगा । जो समुद्री दूरी तय करने में पहले 36 घण्टे का समय लगता था, वह बाद में घटकर केवल 12 घंटों तक ही सीमत रह जाएगा, और इसकी बदौलत हजारों करोड़ रूपये की विदेशी मुद्रा की बचत हो जाया करेगी, जो कि अभी हमें तेल के आयात पर खर्च करनी पड़ती है । केवल यही नहीं, एक नया समुद्री रास्ता खुल जाने से 13 नए बंदरगाह भी बनाये जाएंगे, जिसकी वजह से हमारे देश के नौजवानो को रोजगार मिलेगा । अभी विदेशी तटों से दूसरे जहाजों पर सामान लादने (ट्रांसशिपमेंट - Transhipment) की जरुरत जो हमें पड़ती है, वह भी धीरे-धीरे समाप्त हो जाएगी, जिसके कारण लगभग 2500 करोड़ रूपये का शिपमेंट शुल्क अभी जो हमारे देश को देना पड़ता है, वह खर्च भी बच जाया करेगा । केवल इतना ही नहीं, दूसरे देशों के लिए उनके जहाजों को इस रास्ते से गुजरने के लिए और उनको ट्रांस-शिपमेंट सुविधा देने के लिए जहाजों से प्राप्त होने वाले शुल्क से करोड़ों रुपयों की अतिरिक्त आमदनी का साधन भी हमारे लिए बन जाएगा ।

यहाँ तक कि इस इलाके में समुद्री जीवों के विस्थापित होने की बात बताई जा रही है, अक्सर देखा गया है कि इन्सानों की तरह थोड़े ही अरसे बाद वे भी अपने लिए एक नई जगह तलाश कर लेते हैं, और अपने लिए नए रैन बसेरे बना लेते हैं । रामसेतु परियोजना का विरोध करने वालों में से एक और सवाल पूछना चाहता हूँ कि जब कभी आंधी-तूफान या फिर किसी और किस्म की कुदरती आपदा आने पर जब किसी गुरूद्वारे, मन्दिर या फिर मस्जिद की कोई दीवार ढह जाती है या फिर पूरी इमारत ही गिर जाती है तो क्या उस मलबे को सड़क पर ही पड़े रहने दिया जाता है, या फिर उस मलबे को उठाकर सड़क पर आवाजाही को बहाल नहीं किया जाता? और क्या बाद में उसकी जगह गिरी हुई इमारत का नवनिर्माण नहीं किया जाता? या फिर उस मलबे को वहीँ पर पड़े रहने देना चाहिए और अपनी मंजिल तक पहुँचने के लिए किसी लंबे रास्ते की तलाश करनी चाहिए? इस राम सेतु के मलबे को जो कि सदियों से समुद्र की सतह पर पड़ा है, उसे तो कोई देखने तक भी नहीं गया, तो फिर उसके प्रति झूठी शान और श्रद्धा कैसी? विरोध करने वाली राजनीतक पार्टियों और दलों को थोड़ा इस नज़रिये से भी सोचना चाहिए कि उनका रामसेतु परियोजना का विरोध दरअसल राष्ट्रहित में है या फिर राष्ट्र विरोधी? जो लोग विरोध प्रदर्शन के लिए ट्रक भरकर लोगों को लाकर सड़क पर खड़ा कर देते हैं, और आवाजाही के सभी साधन ठप्प कर देते हैं, उनको जरा इस बात पर गंभीरता से विचार करना चाहिए कि उनका यह कारनामा असलियत में हमारे देश को कितना पीछे धकेल रहा है? लोगों को ग़लत बातें बताकर उनको भड़काया जा रहा है ताकि अपनी राजनैतिक स्वार्थ सिद्धि की दुकान चलती रहे ।

दूसरी बात, जिस प्रकार आए दिन किसी-न-किसी मामले को लेकर धर्म का राजनीतिकरण हो रहा है, उसे किसी भी दृष्टि से उचित नहीं ठहराया जा सकता । आज हमारे देश में, आम लोगों को धर्म को अफ़ीम की तरह चटाकर, उन्नति और विकास की योजनाओं को ठण्डे बस्ते में डाल दिया जाता है, उसे नेता लोग भले ही अपने लिए अल्प अवधि के लिए राजनीतिक लाभ अर्जित करलें, लेकिन दूरदृष्टि से सोच-विचार किया जाए तो आपको पता चलेगा कि ऐसी चालों से देश को कितना नुक्सान होता है, देश के लिए इसके परिणाम हरगिज़ अच्छे नहीं होते, बल्कि यह देश को पीछे धकेलने का काम करते हैं। श्रीनगर की समस्या भी एक ऐसा ही मुद्दा है, जिससे आजादी के समय से ही अच्छे ढंग से सुलझाया नहीं गया और आज तक पूरा देश इसका खामयाजा कितना नुक्सान उठाकर भुगत रहा है ! अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत अपने प्रतिद्वंदियों से प्रतिस्पर्धा में बहुत पिछड़ जाता है । जरा सोचिये ! जहाँ बाकि प्रगतिशील देश चाँद पर पहुँचने के बाद आगे मंगल गृह तथा इसके भी आगे की जाने हेतु सोच रहे हैं । उन्होंने गहरे-से-गहरे समुद्रों में भी खोजबीन कर ली है और आगे बढ़ने के लिए वे लोग निरंतर प्रयासरत रहते हैं। लेकिन इसके बिलकुल विपरीत हम 125 करोड़ की आबादी वाला एक विशाल देश, आज भी मध्यकालीन युग में ही रहने के लिए विवश हैं ……… कारण हमारे देश के नेता लोगों के दिलो-दिमाग पर राजनीति इस कदर छाई रहती है कि उन्हें अपनी स्वार्थ सिद्धि के इलावा कुछ और दिखाई ही नहीं देता ! ज़रा ध्यान से विचार करें तो आपको पता चलेगा कि ऐसी प्रस्थितियाँ देश के लिए कितनी नुकसानदेह और दुर्भाग्यपूर्ण हैं ।

अच्छा होगा अगर ऐसे नेता अपने संकीर्ण नज़रिये व अल्पकालीन लाभ को त्यागकर सम्पूर्ण राष्ट्रहित में सोचते हुए लम्बी अवधि के लिए लाभ की ओर पूरे तनमन से ध्यान दें, ताकि विवादास्पद गतिरोध समाप्त हो जाए और इतने लम्बे अरसे से अधर में पड़ी हुई योजनाओं को जल्द-से-जल्द मुकम्मल किया जा सके । वैसे भी, विवेक और बुद्धिमता तो इसी में होती है कि आदमी अपने किसी बड़े उद्देश्य या लक्ष्य को हासिल करने के लिए छोटे-मोटे लाभ-हानि को बिलकुल ही दरकिनार कर दे । तभी वह ज़िन्दगी में अच्छे तरीके से आगे बढ़ सकता है और तब सफलताएं भी उसी के कदम चूमती है । यही दिशा और दशा राष्ट्रों की भी होती है । हमारे नेता गण इस मामले को जितनी जल्दी समझ पाएंगे, उतनी ही राष्ट्र तीव्र गति से उन्नति और तरक्की करेगा और हम विकास की दिशा में आगे ही आगे बढ़ते चले जाएंगे और हम हजारों करोड़े रूपये की विदेशी मुद्रा भी फिज़ूल में खर्च करने से भी बच पाएंगे ! और दूसरे जहाजों पर सामान लादने व उतारने (ट्रांसशिपमेंट - Transhipment) के जरिये प्रति वर्ष लगभग 2500 करोड़ रूपये की जो अतिरिक्त आमदनी होगी, वह अलग ।

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