Search & get (home delivered) HOT products @ Heavy discounts

Sunday, September 4, 2016

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वरः

प्रो. उर्मिला पोरवाल (सेठिया)
विभागाध्यक्ष हिन्दी विभाग
शेषाद्रिपुरम महाविद्यालय बैंगलोर


भारत के भूतपूर्व राष्ट्रपति एवं शिक्षाविद्‍ डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जयंती (5 सितंबर) जिसे सन् 1963 में व्यापक समर्थन मिला, तबसे प्रतिवर्ष शिक्षक दिवस के रूप में यह दिन मनाया जाता है। विश्व के कुछ देशों में शिक्षकों (गुरुओं) को विशेष सम्मान देने के लिये शिक्षक दिवस का आयोजन होता है,और कुछ देशों में छुट्टी रहती है, जबकि कुछ देश इस दिन कार्य करते हुए मनाते हैं।

गुरु का स्थान तो माता-पिता से भी ऊँचा होता है, क्योंकि माता-पिता जीवन देते हैं और गुरु उस जीवन का सही अर्थ समझाकर, सत्य का मार्ग दिखाते हैं।

गुरु और शिष्य के बीच एक अनोखा रिश्ता होता है। गुरु एक घने वृक्ष की तरह अपने शिष्य को हर तरह से छाया प्रदान करता है। चाहे वह एक पिता की भूमिका हो, एक गुरु की या फिर एक पथप्रदर्शक की।
गुरु और शिष्य के बीच इस अनूठे बंधन को मजबूत करने के लिए अगर किसी चीज़ की ज़रूरत होती है तो वह है गुरु के प्रति शिष्य का विश्वास, श्रद्धा और सम्मान।

शिक्षक दिवस एक ऐसा दिन है जब हम उन गुरुओं का धन्यवाद कर सकते है, जिन्होने हमें शिक्षा प्रदान कर हमारे जीवन में उजाला भर के हमें जीवन जीने के सही तरीके से अवगत कराया हैं।

अगर हम हमारी पौराणिक कथाओं की ओर दृष्टिपात करें तो हमें गुरु और शिष्यों के रिश्ते के कई ऐसे उदाहरण मिल जाएँगे जो आज के समय में मिलना मुश्किल हैं। गुरु और शिष्य के अनूठे रिश्ते की बात हो तो एकलव्य और द्रोणाचार्य का ज़िक्र होना स्वाभाविक है।एकलव्य ने अपने गुरु द्रोणाचार्य को गुरु दक्षिणा के रूप में अपना अँगूठा देकर उनका मान रखा। उसने एक सच्चा शिष्य होने का कर्तव्य निभाया। यही नहीं इस अनुपम रिश्ते का एक उदाहरण और दिया जा सकता है, जिसे आज भी लोग स्वामी विवेकानंद और उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस के नाम से याद करते हैं।

हमारे पुराणों में जितने भी महान लोगों का वर्णन है, उन सभी ने अपने गुरुओं के सान्निध्य में ही जीवनयापन के तथ्यों के बारे में जाना और उन्हें अपने जीवन में अपनाया। विवेकानंद एक ऐसे शिष्य थे जिन्होने अपने गुरु से जीवन जीने का सही तरीका सीखा। उन्होने अपने गुरु के दिखाए पथ पर चलते हुए न जाने कितने लोगों के जीवन में प्रेम, नि:स्वार्थ सेवा और सत्यता का दीपक प्रज्वलित किया।

आधुनिक युग में शिक्षक की भूमिका महत्वपूर्ण है। शिक्षक वह पथ प्रदर्शक होता है जो हमें किताबी ज्ञान ही नहीं बल्कि जीवन जीने की कला सिखाता है। भारतीय संस्कृति में शिक्षक को दो स्वरूपों में देखा जाता है। जिन्हें आध्यात्मिक गुरु और लौकिक गुरु के रूप में परिभाषित किया गया है। चूँकि बात शिक्षक दिवस के प्रसंग से जुड़ी है इसलिए यहाँ लौकिक स्वरूप में शिक्षक के बारे में चर्चा करना प्रासंगिक है।

शिक्षक को मौजूदा परिप्रेक्ष्य में एक अध्यापक के रूप में ही देखा जाता है। यद्यपि सामाजिक व्यवस्था में यही उसकी सेवा है इसलिए शिक्षक को अध्यापक तक ही सीमित कर दिया गया है जबकि इसे व्यापक अर्थों में देखा जाना चाहिए। शिक्षक वह जीवन की मूर्ति है, जो दूसरों को ज्ञान का उजाला बाँटकर उनके जीवन को गतिशील, भावना, और उच्च विचारों से जुड़े कर्म कर जीवन की ऊँचाइयों पर ले जाते हैं।

कहते हैं यदि जीवन में शिक्षक नहीं हो तो 'शिक्षण' संभव नहीं है। शिक्षण का शाब्दिक अर्थ 'शिक्षा देने' से है लेकिन इसकी आधारशिला शिक्षक रखता है। शिक्षक का दर्जा समाज में हमेशा से ही पूज्यनीय रहा है क्योंकि उन्हें 'गुरु' कहा जाता है लेकिन अब जबकि सामाजिक व्यवस्थाओं का स्वरूप बदल गया है इसलिए शिक्षक वर्ग भी इस परिवर्तन से अछूता नहीं रहा है। शिक्षा प्रणाली में शिक्षा के प्रति अध्यापकों के इस बदलाव का क्या कारण है? दिल्ली के विश्वविद्यालय शिक्षक विद्‍युत चक्रवर्ती का कहना है कि ‘अध्यापकों में आज उतनी निष्ठा नहीं है, न ही विद्यार्थियों के प्रति लगाव है। कारण है कि शिक्षकों में मूल्यों में परिवर्तन आ गया है। पहले शिक्षक विद्या‍र्थियों के लिए सुख सम्पत्ति, सब कुछ त्याग कर देते थे।इस हो रहे बदलाव के साथ-साथ अध्यापकों के पढ़ाने के अंदाज में भी परिवर्तन आ गया है। अधिक धन कमाने की इच्छा में अध्यापक आज कुँजी पुस्तकों से पढ़ाते हैं ताकि परीक्षा के समय विद्यार्थी जैसे-तैसे सफलता हासिल कर सके........ विद्यार्थियों में भी अध्यापकों के प्रति आदर, श्रद्धा नहीं रह गई है।
आज यह प्रणाली अधिक धन कमाने का स्रोत है।

आज छात्रों के समक्ष कोई ऐसे शिक्षक नहीं जिनसे वे प्रेरित हो सकते हैं। राजनीति के रंगमंच में अब अध्यापक एवं विद्यार्थी भाग लेने लगे हैं। विश्वविद्यालयों में छा‍त्र संगठन होने के कारण शिक्षा प्रणाली दूषित हो गई है। इन पर अंकुश लगाए जाने की जरूरत है। आज बढ़ती प्रतियोगिता और बच्चों के बढ़ते ज्ञान ने जिस प्रकार कर्म के साथ समझौता किया है, उससे लगता है कि ज्ञान और कर्म की शिक्षा आज के समय में जिंदा रहने की अनिवार्यता बन गई है। लेकिन इसमें ज्ञानी और कर्म दोनों को रोना पड़ता है।शायद इसके लिए जिम्मेदार है भारतीय समाज जोकि पश्चिम देशों का अनुकरण कर अपने सांस्कृतिक मूल्यों को भूलते जा रहे हैं।

सामाजिक मूल्यों में बदलाव के बावजूद आज कई ऐसे शिक्षक हैं जो बच्चों को निष्ठा, त्याग, सहनशीलता से पढ़ा रहे हैं।हमारे तमाम शिक्षक जब ज्ञान और कर्म की शिक्षा में स्कूल से लेकर विशेष संस्थानों और विश्वविद्यालयों तक जुड़े हैं, वे अपने कर्म के प्रतीक बड़े से बड़े इंजीनियर, डॉक्टर, एमबीए का निर्माण करते हैं। बच्चों के अंदर भावना और संभावनाओं का विकास कर उन्हें देश को उन्नति की राह पर ले जाने की शिक्षा देते है।

आज का युग कम्प्यूटर युग है। कम्प्यूटर के आने से देश, समाज में एक नई क्रांति का आह्वान हुआ है। लेकिन फिर भी ‍बच्चों के दिलों दिमाग में ज्ञान का भंडार भरने वाले शिक्षकों का आज भी उतना ही महत्व है जितना भी पुराने जमाने में था। माता-पिता के बाद बच्चों को सही शिक्षा देने में शिक्षकों का महत्वपूर्ण स्थान है। शिक्षक द्वारा दी जाने वाली ज्ञान की जो रफ्तार है, उससे एक दिन ऐसा आ जाएगा जब समूचा ब्रह्मांड ज्ञान के समक्ष छोटा लगेगा।

आज शिक्षक दिवस है। इस दिन डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के बहाने शिक्षकों को सम्मानित करने का दिन है। यूँ तो सही मायने में देखा जाए तो 'गुरुर ब्रह्मा गुरुर विष्णु' के विचार और उससे जुड़े अध्यात्म को अंगीकार करने वाले देश को शिक्षकों के प्रति आदर भाव प्रकट करने के लिए किसी विशेष दिन की जरूरत नहीं है... उनका आदर सत्कार तो‍ दिल से किया जाता है। पर ठीक है इस बहाने ही सही, गुरु-शिष्य के संबंधों की आदर्श परिभाषा को तो याद किया ही जा सकता है।

हमारी दुनिया में शिक्षक एक महान मूर्ति की तरह होता है पर कई बार छात्रों द्वारा ‍की गई अवांछनीय हरकतों के कारण ऐसा प्रतीत होता है जैसे शिक्षक चौराहे पर लगी उपेक्षित मूर्ति के समान है। मूर्ति बनने का सबसे बड़ा अभिशाप ही यह है कि उसे उपेक्षित होना पड़ता है। जिस प्रकार किसी मूर्ति का उद्‍घाटन केवल उसी दिन की शोभा होती है। उसी प्रकार हम केवल एक दिन यानी '5 सितंबर' को 'शिक्षक दिवस' मना कर शिक्षकों को उपेक्षित करते है। असल में शिक्षकों का सम्मान तो हर पल, हर दिन, हर समय होना चाहिए ताकि हमें ज्ञान का भंडार देने वाले उन शिक्षकों को हम सही मायने में पूज सकें। उनके द्वारा दिए गए गुणों को ग्रहण कर हम देश, समाज, विश्‍व, हमारे पारिवारजनों का सही मायने में कर्ज अदा कर पाएँगे। उन्हें सही मायने में पूजा कर पाएँगे। ऐसे महान शिक्षकों को शिक्षक दिवस पर शत् शत् नमन.... !

Thanks for your VISITs

 
How to Configure Numbered Page Navigation After installing, you might want to change these default settings: