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Saturday, August 13, 2016

देश की पुकार भारतवर्ष के नाम का डंका पुरे विश्व में कायम हो

Prime Minister Pt Jawaharlal Nehru delivering his first Independence Day address
(एस. एस. डोगरा)

हम फिर एक बार से स्वतंत्रता दिवस मनाने जा रहे हैं आजादी के मतवालों को समर्पित इस दिन को पुरे देश में बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है. जी आप निम्न बोल पर गौर फरमाएँ :

“सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तान हमारा
हम बुलबुले है इसके ये गुल्स्तिना हमारा”


इकबाल जी के उक्त बोल इस विशाल देश के प्रतेयक देशवासी में जोश भरने में खूब कारगार साबित होते हैं। लेकिन क्या इन अनमोल बोलों के वर्तमान भारतवासी कुछ तव्वज्जो देते हैं। हम स्वंम अपने को टटोल कर देखे, उक्त बोल के मुताबिक क्या वास्तव में हमारा देश सब देशों से अच्छा है??? हम खोखले हैं लेकिन अपने को मजबूत बनाने व अपने को सच्चाई से सिद्ध करने का माद्दा ही नहीं रखते हैं। बड़े बड़े नेता अनेक जन सभाओं में बुलंद आवाज से अनेक प्रसंग प्रस्तुत कर आम जनता को भ्रमित कर केवल सहानुभूति लेकर अपनी कुर्सी व स्थान बनाए रखने के लिए ना जाने क्या क्या अनाप शनाप झूठे वादे करते नहीं थकते हैं।

सम्राट अशोक का साम्राज्य हो या मुग़ल बादशाह अकबर,, राणा प्रताप हो, टीपू सुल्तान, झाँसी की रानी लक्ष्मी बाई, नेता सुभाष बोस, चाचा नेहरू, महात्मा गांधी, सरदार भगत सिंह, स्वामी विवेकानंद जी, सरदार पटेल, लाल बहादुर शास्त्री जी, इन्दिरा जी, अटल जी जैसे जैसे सैंकड़ो प्रभावशाली व्यक्तित्व ने सदा भारत देश को विश्व में अनोखी पहचान बनाने में प्रमुख भूमिका अदा की।

मुझे पुरानी फिल्म के बोल याद आते हैं
जहाँ डाल डाल पर सोने की चिड़िया करती है बसेरा
वो भारत देश है मेरा, वो भारत देश है मेरा

लेकिन हम, आज, इन देश भक्ति गीतों को भुलाएँ बैठे हैं। पहले आजादी के बाद से लेकर 1980 तक तो कुछ अच्छी देश भक्ति फिल्मे बनी। विशेष तौर पर मनोज कुमार जी ने अपनी माटी से लगाव भरी अनेक फिल्में बनाकर देश में पूरे देश में देशभक्ति का माहौल पैदा करने में बहुमूल्य योगदान दिया। लेकिन पिछले तीन दशकों में हमारे फ़िल्मकारों ने देश के प्रति क्या योगदान दिया है यह किसी से छुपा नहीं है। आज रेडियो, टीवी व साहित्य यानि पूरा मीडिया अपने देश के प्रति कितना निष्ठापूर्वक भूमिका निभा रहा है। यह वास्तव में गंभीरता का विषय है। पूरे देश का वातावरण दूषित हो चुका है किसी को अपने देश की छवि से कोई लेना देना नहीं है।

आजादी के बाद सूचना तकनीक में क्रांति तो आ गई सब कुछ मोबाइल पर सिमट आया है लेकिन तकनीक से तो हम बहुत आगे बढ़ गए परंतु देश के प्रति अपने फर्ज निभाने में हम उतने ही पीछे हो चले हैं। उस दौर को याद कीजिए जब 1971 की पाक से हुई लड़ाई के दौरान किस तरह सेना की टोलियों को युद्ध क्षेत्र में लड़ने के लिए कितनी गर्मजोशी से विदा किया जाता था। चीन से हुई लड़ाई हो, या फिर कार्गिल का युद्ध, प्राकर्तिक आपदा में दिन-रात सेवा में जुटी सेना की प्रशंशा के लिए दो शब्द तक जुबान पर लाने में न जाने क्यों शर्म आती है। क्या हमें मालूम है कि सीमा रेखा पर तैनात हमारे सैनिक विपरीत स्थितियों में भी किस तरह देश की सुरक्षा के लिए अपनी जान की बाजी लगाने में जरा भी संकोच नहीं करते हैं। बावजूद इसके हम इन सच्चे सैनिकों को मान सम्मान देने व आर्थिक व मानसिक सुरक्षा देने में कितने सहायक होते हैं। यहाँ भी हमारे मीडिया को ही दोषी ठहराया जाता है इसमें कोई संदेह भी नहीं है।

आज देश निर्माण, देश भक्ति, स्वच्छ समाज कल्याण के बारे में सबने सोचना ही छोड़ दिया। परिस्थितियाँ बदल रही हैं जिस देश की माटी पर जन्म लिया है हम उसे ही भूले जा रहे हैं। हमारे युवा वर्ग किसी भी देश नायक का फोटो तक नहीं पहचानता है उसे सलमान, सन्नी लियोन, केटरीना, रणबीर कपूर, दीपिका पसंद है लेकिन पाँच सच्चेदेशभक्त के नाम तक नहीं गिनवा सकता है। इसमें हमारी युवा पीड़ी से ज्यादा समाज के वर्ग विशेष की नकारत्मक सोच ही इसके लिए दोषी है. उसे समाज तथा अपनी नई पीढ़ी को देश, समाज व् बड़ों के प्रति आदर भाव सिखाना होगा. लोगों को कभी, राम के नाम पर कभी अल्लाह के नाम पर तो कभी वाहे गुरु के नाम पर भुनाया जाता है। देश भुखमरी, बेरोजगारी, क्षेत्रवाद, जनसँख्या, सामाजिक, धार्मिक, राजनैतिक विषमताओं से लकवाग्रस्त है परन्तु इसके निवारण की कोई भी नेता नहीं सोचता है, सब कुर्सी हथियाने की सोचते हैं.

वैसे भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंदर मोदी जी की क्रियाशीलता तथा समाज के सभी वर्गों विशेषकर अनछुए विषयों को प्राथमिकता आधार पर कार्य करना शुभ संकेत हैं. उनके आने के बाद अनेक देशों में उनकी व्यक्तिगत यात्राओं से आभास होता है कि अपने देश की छवि में चार चाँद लगाने में अहम् भूमिका अदा की है.

कम पढ़े लिखे , अज्ञानी व् निष्क्रिय लोगों को जन प्रतिनिधि चुनकर क्या हम अपने देश व् समाज के साथ खिलवाड़ नहीं कर तो और क्या है. अमेरिका जैसे विशाल देश के राष्ट्रपति जे. एफ. केनेडी ने भी एक बार आम सभा में अपने देश वासियों को ललकार भरे भाषण में कहा कि “हम अपने देश से बहुत उम्मीदें रखते हैं कि सारी सुविधाएँ जुटाए, परन्तु क्या देश के लिए भी हमें कितना उपयोगी व् देशभक्त होना चाहिए यह बहुत मायने रखता है.” कहने कर अर्थ यह है कि हम अपने देश के विकास व् स्वच्छ समाज निर्माण में कितने सक्रिय होकर देश की खुशहाली कायम करने में सक्षम हैं इस विषय पर विचार कर लागु करना होगा. देश प्रेमी, समाज सेवी व जागरूक लोगों को एक अभियान समझ कर आगे आना होगा और छोटे=छोटे लेकिन नियमित प्रयासो से हल ढूँढना पड़ेगा। ऐसा सकारत्मक माहौल पैदा कर ही हम अपने गौरव शाली व् विशाल भारत वर्ष का उद्धार करने में कामयाब हो पाएंगे. आज यही देश की पुकार है इसे एक देश व्यापी अभियान के रूप में लेकर घर-घर में अलख जगाने की जरुरत है तभी इस ऋषि मुनियों की पावन भूमि पर पुनः स्वस्थ माहौल पैदा हो पायेगा और देश मजबूत होगा. यही हम सब का लक्ष्य होना चाहिए. उसी स्थिति में भारतवर्ष के नाम का डंका पुरे विश्व में कायम होगा.

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