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Monday, August 22, 2016

महाभारत का रहस्यमई पात्र - युयुत्सु !

आर.डी. भारद्वाज "नूरपुरी "

यह एक सर्वविधित सत्य है कि महाभारत का युद्ध आज से लगभग 5200 वर्ष पूर्व कुरुक्षेत्र में हुआ था । इस युद्ध का एक मात्र कारण इस बात को लेकर पैदा हुआ था कि हस्तिनापुर के दृष्टिहीन राजा धृतराष्ट्र के बाद उसका उत्तराधिकारी कौन होगा , क्योंकि धृतराष्ट्र के सबसे बड़ा पुत्र दुर्योधन तो अपना हठ त्यागने को हरगिज़ तैयार नहीं थाऔर वैसे उस वक़्त के प्रचलित नियमों के हिसाब से सबसे बड़ा पाण्डु पुत्र युधिष्ठर को दुर्योधन से बड़ा होने के कारण उत्तराधिकारी बनने का सौभाग्य प्राप्त होना चाहिए था ।शोधानुसार जब महाभारत का युद्ध हुआ, तब श्रीकृष्ण की आयु तकरीबन 83 वर्ष थी और इस युद्ध के 36 वर्ष बाद उन्होंने अपना नश्वर शरीर त्याग दिया था । विद्वान लोग यहभी मानते हैं कि इस यद्ध के बाद ही कलियुग का आरंभ हुआ था ।

महाभारत का यह युद्ध 18 दिनों तक चला था। इस युद्ध के प्रारंभ होने पहले दोनों पक्षों के वरिष्ठ सदस्यों ने बैठकर इसके कुच्छ नियम बनाए थे - जैसे कि प्रतिदिन युद्ध सूर्योदयसे लेकर सूर्यास्त तक ही रहेगा, सूर्यास्त के बाद युद्ध नहीं होगा, युद्ध समाप्ति के पश्चात सब प्रकार के छल-कपट छोड़कर सभी लोग प्रेम का व्यवहार करेंगे, रथी रथी से, हाथीवाला हाथी वाले से, घुड़सवार - घुड़सवार से ही और पैदल पैदल से ही युद्ध करेगा, एक वीर के साथ एक ही वीर युद्ध करेगा, भय से अपनी जान बचाकर भागते हुए या शरण में आएहुए लोगों पर अस्त्र-शस्त्र का प्रहार नहीं किया जाएगा, जो वीर निहत्था हो जाएगा उस पर कोई अस्त्र नहीं उठाया जाएगा, युद्ध में सेवक का काम करने वालों पर / युद्ध में घायलोंको उठाकर इलाज़ के लिए ले जाने वालों पर भी कोई अस्त्र शाश्त्र नहीं उठाएगा, इत्यदि ।

यूँ तो उस वक़्त के इस सबसे भयानक युद्ध के अनेकों ही दिलचस्प किस्से और पात्र हैं, मगर इस लेख द्वारा कौरव पुत्रों के बारे में एक रोचक तथ्य पर ही विचार करेंगे । धृतराष्ट्रके पुत्रों का जब भी जिक्र आता है तो ऐसा ही कहा और लिखा जाता है कि उसके सौ पुत्र थे । लेकिन यह एक अधूरी सच्चाई है , दरअसल राजा धृतराष्ट्र के एक सौ एक पुत्र औरएक मात्र पुत्री दुशाला थी । उसके एक सौ एकवें पुत्र - युयुत्सु का नाम अक्सर लोग भूल ही जाते हैं , शायद इस लिए कि धृतराष्ट्र की पत्नी गांधारी ने उसको जन्म नहीं दिया था ।

महाभारत के युद्ध शुरू होने से पहले जब कौरवों और पांडवों की सेनाएं कुरुक्षेत्र रण भूमि में आमने सामने खड़ी थीं, इसी दौरान भीष्म पितामह ने एक घोषणा करते हुए युद्ध होनेके कारण सभी को फिर से स्पष्ट रूप में बताये । उन्होंने ने यह भी घोषणा की कि अगर वहाँ पर उपस्थित और युद्ध में भाग ले रहे सभी योद्धायों और सैनकों में से कोई भी ऐसायोद्धा या सैनिक जो अपनी बुद्धि और विवेकानुसार यह अनुभव करता है कि इस युद्ध में कौरवों का दृष्टकोण गलत है और यह इतना बड़ा युद्ध खामखाह ही पांडवों पर थोपा जारहा है, तो वह योद्धा अभी अपना पाला बदलकर पांडवों के खेमे में जा सकता है। और इसी प्रकार, यदि कोई योद्धा अभी पांडवों के खेमे में खड़ा है, लेकिन वह ऐसा अनुभव कर रहाहै कि इस युद्ध में पांडव गलत हैं, तो वह भी कौरवों के खेमे में अभी जा सकता है । ऐसी घोषणा होने के पश्चात पूरी युद्ध सेना और योद्धायों में से, केवल धृतराष्ट्र का एक पुत्रयुयुत्सु ही था जिसने अपने कौरव भाईओं के घुटन भरे बर्ताव और माहौल से परेशान होकर और सुख की साँस लेते हुए उनका खेमा छोड़कर पासा बदल लिया और वह पांडवों मेंशामिल हो गया था। उसका पाला बदलने का एक और कारण यह भी था कि सभी कौरव भाईओं ने युयुत्सु को कभी दिल से इज्जत, मान, सम्मान नहीं दिया था, ना ही उसेअपना भाई माना, बल्कि वह अक्सर उसको "दासी पुत्र" बोलबोल कर जली कटी सुनाने वाले / चिढ़ाने वाले व्यंगबाण चलाते ही रहते थे । ऐसा युधिष्ठिर और दुःशासन के क्रियाकलापों के कारण ही संभव हुआ था। महाभारत का यह यद्ध १८ दिन चला और जैसा कि श्री कृष्ण ने यह पहले ही घोषणा कर दी थी कि यह एक धर्म युद्ध है और इस युद्ध केअन्त में अधर्म की डगर पर चलने वाले कौरव बुरी तरह हार गए और धर्म के रास्ता पकड़ने वाले पाण्डवों की जीत हुई। और ऐसे एक सौ एक कौरव भाईओं और धृतराष्ट्र केएकमात्र दामाद, जयद्रथ में से केवल एक युयुत्सु ही जिन्दा बचा था ।

इसका कारण : धृतराष्ट्र और पाण्डु भाईओं में से धृतराष्ट्र बड़ा था , समय आने पर उसका विवाह गांधार के राजा सौभाली की पुत्री गांधारी से रचा दिया गया था और पाण्डु कीशादी राजा कुन्तिभोज की पुत्री कुंती से हो गई थी । कुदरत की करनी कुच्छ ऐसी हुई कि धृतराष्ट्र की शादी के दो वर्ष पश्चात भी उनके घर कोई सन्तान नहीं हुई, जबकि पाण्डुकी पत्नी कुंती ने अपने बड़े बेटे युधिष्ठर को जन्म दे दिया था । इसी बीच , धृतराष्ट्र को एक सुखद समाचार मिला कि उसकी पत्नी गांधारी भी गर्भवती हो चुकी है । गांधारी केगर्भकाल के दौरान राजा धृतराष्ट्र की व्यक्तिगत आवश्यकतायों को पूरा करने के लिए सैवाली नाम की एक दासी को नियुक्त किया गया । और यह बात भी जगजाहिर है किराजा महाराजायों और मंत्रियों की दासियाँ या सेविकाएँ केवल नौकरानियाँ ही नहीं होती थी, उनका असली दर्जा और रिश्ता अपने स्वामी की इच्छानुसार ही बनता / बिगड़ता रहता था ।

तो ऐसे धृतराष्ट्र की यह दासी सैवाली (कुछ इतिहासकार इसका नाम सुगधा भी बताते हैं) का सम्बन्ध धृतराष्ट्र से दासी से कुछ ज्यादा ही था । और जब गांधारी ने अपने बड़े बेटेदुर्योधन को जन्म दिया तो उसके कुच्छ समय बाद दासी सैवाली ने भी एक बेटे को जन्म दिया, और धृतराष्ट्र के इस पुत्र का नाम युयुत्सु रखा गया । युयुत्सु दुर्योधन से तो छोटा था, लेकिन अपने बाकी कौरव भाईओं से बड़ा था । जैसे २ कौरवों के बच्चे बड़े होते गए और दुर्योधन और उसके भाईओं को युयुत्सु और उसकी माता के बारे में और जानकारी  मिलती गई, उनका विवहार और बर्ताव युयुत्सु के साथ प्यार मोहब्बत का ना होकर थोड़ी नफ़रत, कड़वाहट और भेदभाव वाला ही बनता चला गया । दरअसल, बाकी कौरवभाई उसका उसी तरह निरादर करते रहते थे जैसे करण की जिन्दगी में उसके जन्म सम्बंधी रहस्य खुलने से पहले पाण्डु पुत्र करण को "सूद्पुत्र २" बोलकर उसका अपमान कियाकरते थे । यही कारण था कि युयुत्सु भी बाकी अपने सौ कौरव भाईओं के साथ अक्सर नाखुश ही रहता था और उनके बीच का यह फासला समय के साथ चलते २ बढ़ता ही चलागया , जबकि इसके बिलकुल विपरीत, पांडव भाईओं ने उसके साथ कभी कोई भेदभाव वाला रिश्ता नहीं निभाया ।

कौरव भाईओं में युयुत्सु का स्थान लगभग वैसा ही था जैसा कि रावण के दरबार में विभीषण का था । यह बात और है कि करण सूदपुत्र होने के बावजूद भी कौरवों का चहेता बनगया था, क्योंकि - दुर्योधन को उस वक़्त के सब से बड़े धनुर्धर -अर्जुन का मुक़ाबला करने के लिए एक ऐसा बहादुर योद्धा चाहिए था जोकि उसको पराजित कर सके और जो युद्धहोने की स्थिति में दुर्योधन की जीत सुनिश्चित कर सके । केवल और केवल इसी वजह से ही दुर्योधन ने करण को एक सूद्पुत्र होने के बावजूद भी केवल उसे अपना पर्म मित्र हीनहीं बनाया, बल्कि अपने हिस्से का इलाका - अँग प्रदेश (आजकल के हरियाणा में - करनाल) भी उसे देकर, करण को वहाँ का राजा नियुक्त कर दिया था, जोकि एक तरह काएक गूड़ा राजनितिक छड़यन्त्र या फिर चाल मानी जा सकती है, क्योंकि आने वाले वक़्त में दुर्योधन ने करण को पांडवों के ख़िलाफ़ इस्तेमाल करना था ।

युद्ध की समाप्ति के बाद सबसे बड़ा पाण्डु पुत्र युधिष्ठर तो मात्र पन्द्राह वर्ष तक ही सिंहासन पर बिराजमान रहा , क्योंकि वह तो बहुत बार महाभारत युद्ध में मारे गए लाखों वीरों /अपने करीबी व सखे सम्बन्धियों और दोनों पक्षों के लाखों सैनिकों के बारे में सोच २ कर अक्सर परेशान हो जाया करता था। क्योंकि लाखों लोगों ने इस इतने भयानक युद्ध कीत्रासदी झेली और तीस पैंतीस लाख लोगों को मौत की नीन्द सुला दिया गया ! फ़िर , अपनों को खोने का ग़म और असली दर्द तो केवल उनके घरों में शेष बची औरोतों और बच्चोंको ही झेलना पड़ता है ! एक और बात , प्राण गँवा चुके लोगों का अंतिम सँस्कार करने के लिए लकड़ियाँ और और बाकी सामग्री भी उनको नसीब नहीं हुई थी ! इसके बाद जबपांडवों ने अपना राजपाठ त्यागकर , वाणप्रस्थ जाने और अर्जुन के पोत्र परीक्षित को राजगद्दी सौंपने का निर्णय ले लिया, तो युयुत्सु को उन्होंने परीक्षित का मुख्य सलाहकारऔर संरक्षक नियुक्त कर दिया था । मगर यह बात भी गलत नहीं है कि कौरवों ने युयुत्सु को भी उसी तरह गद्दार माना और जाना था जैसे कि रावण के दरबार में विभीषण को माना जाता था । लेकिन अगर हम युयुत्सु के जन्म से लेकर बड़े होने तक उसके जीवन में घटित होने वाली अनेकों स्थितियों और प्रस्थितियों की पूरी श्रृंखला पर थोड़ा गंभीरतासे विचार करें कि तथाकथित अपनों के बीच रहते हुए भी यहाँ आपकी सोच और धारणा को दूसरे हमेशा नकारते ही रहे हों , कोई आपको इज्जत, मान - सम्मान ना दे और औरवक़्त बेवक़्त आपके भाई आपको नीचा दिखाने में ही लगे रहें, तो ऐसी निन्दा और अपमान के घूँट पीकर कोई कितने दिन उनका साथ निभा पाएगा ? आत्म-सम्मान किसी भीतर्कशील व्यक्ति की एक ऐसी पूँजी होती है जिसे वह किसी भी कीमत पर गँवाना या खोना नहीं चाहता । सो ऐसे में युयुत्सु द्वारा कौरवों का ख़ेमा हमेशा के लिए छोड़ना, वोह भीतब , जब आपके खानदान के बड़े बजुर्गों ने इसके लिए युद्ध शुरू होने से पहले ही आपको एक विकल्प दिया हो, तो ऐसे फ़ैसले को गलत मानना कोई उचित और तर्कसंगितविश्लेषण नहीं कहा सकता।

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