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Sunday, July 3, 2016

यादगार ही किरदार करने की चाहः रवीना टंडन

प्रेमबाबू शर्मा

रवीना टंडन 90 के दशक की एक कामयाब हीरोइन रही हैं। वो हमेशा पहले से बनी लीक को तोड़ने वाली रही हैं। चाहे अपनी निजी जिंदगी के बारे में बात करना हो या करियर के शुरुआती दौर में ही दो बच्चियों को गोद लेने का फैसला। रवीना टंडन अब अपकमिंग मूवी ‘मातृ द मदर’ में मां का रोल करती नजर आएंगी। इस फिल्म को अस्तर सईद डायरेक्ट कर रहे हैं। इसके अलावा रवीना पीएंडजी शिक्षा के ‘शिक्षा सुपरहीरोज’ नामक अभियान से जुड चुकी है, जो असली जिंदगी के उन सुपरहीरोज यानी ग्राहकों को प्रेरित करेगा, जो पीएंडजी उत्पाद खरीदकर हजारों गरीब बच्चों की जिंदगी बदलने के इस महान उद्देश्य में अपना योगदान देंगे। हाल में उनसे दिल्ली में मुलाकात हुई पेश है,चुनिंदा अंशः-

फिल्म मातृ किस तरह की फिल्म है ?
‘मातृ’ में महिलाओं के खिलाफ हो रही हिंसा को दिखाया गया है। यह मुद्दा हमारे समाज के लिए एक बड़ी चिंता का विषय बन गया है। फिल्म मात्र में ऐसी घटनाओं में जब सिस्टम फेल हो जाता है तब रियल में हमें महिलाओं के प्रति क्या करना चाहिए इस बारे में बताने की कोशिश की गई है। हमारे देश में ज्यादातर मामलों में इस प्रकार की घटनाओं को हम देख सकते हैं। मै केवल रेप के बारे में नहीं बल्कि महिलाओं के खिलाफ हो रही सभी प्रकार की हिंसा के बारे में कह रही हूं जिसके लिए हमारी ज्यूडिशियल सिस्टम फेल रहता है।


फिल्म की लोकेशन गुरूग्राम ही चयन का करण ?
‘फिल्म नेशनल कैपिटल बेस्ड है और हमने शहर के कई लोकेशन पर शूटिंग की है। जिसमें एक स्कूल और गुड़ग्रांम की सड़कें भी शामिल हैं।

आप आजकल समाजिक कार्य में जुटी है, कोई खास वजह ?
रवीना टंडन ने अपनी खुशी का इजहार करते हुये कहा, ‘‘पीएंडजी शिक्षा के साथ साझेदारी का यह मेरा पहला वर्ष है। इन युवा बच्चों से बात करके बहुत अच्छा लगा, जो काफी प्रतिभाशाली हैं और इनके भविष्य काफी उज्जवल हैं। मुझे यह देखकर काफी अच्छा लगा कि पीएंडजी शिक्षा ने 450 से अधिक स्कूलों का निर्माण एवं सहयोग किया है, जो आठ लाख बच्चों की जिंदगी में बदलाव लाएंगे। मैंने एक बच्चे से बात भी की और उसकी कहानी बेहद दमदार थी। वह बुनियादी ढांचे के अभाव के कारण स्कूल जाने में अक्षम था लेकिन पीएंडजी शिक्षा के दखल के बाद, वह अब अपने पड़ोस के स्कूल में जा सकता है और उसने कड़ी मेहनत करने एवं डाॅक्टर बनने का सपना पूरा करने की योजना बनाई है। मेरा मानना है कि शिक्षा प्रत्येक बच्चे का मौलिक अधिकार है और पीएंडजी शिक्षा जैसे अभियान को देखकर बहुत अच्छा लगता है जोकि गरीब बच्चों को शिक्षा मुहैया करा रहा है और उन्हें उनके सपनों को पहचानने तथा बेहतर जीवन प्रदान करने में मदद कर रहा है।‘‘

शादी के पांच के बाद सिल्वर स्क्रीन पर एक फिर से आने का मन बना लिया कैसा लग रहा है ?
अच्छा लग रहा है कला एक ऐसा कीड़ा हैं जिसे कलाकार चाह कर भी नही भुला सकता है। लेकिन पंाच कैसे बीते पता ही नही चला। जब अनुराग ने फिल्म में काम करने का आफर दिया तो चाह कर भी मना नही कर पायी।

यह सब क्या अचानक हुआ ?
जी। दरअसल,अनुराग जी हमेशा से ही मेरे प्रिय निर्देशक रहे हैं। वह हमेशा से ही चाहते थे कि मैं उनके साथ फिल्मों में काम करूं।

जहां तक मुझे याद है, तो आखिरी बार आपने अनुराग के साथ में फिल्म शूल की थीं ?
जी हाॅ। राम गोपाल वर्मा की इस फिल्म में अनुराग कश्यप ने कहानी भी लिखी थी। जबकि इसके डारेक्टर ई निवास थे.

बदलते समय के चलते एक की समकालीन हीरोईनस मे माधुरी और जूही ने भी सिल्बर स्क्रीन पर वापिसी की इसको लेकर क्या सोचती है ?
माधुरी जूही का वापिसी पर मुझे खुशी है वे गुलाब गंैग नामक से सिल्बर स्क्रीन पर वापिसी की। इस फिल्म की कहानी और उसमें उनके किरदार काफी मजबूत है। मैं ऐसी ही यादगार किरदार निभाने की चाह रखती हॅू।

दो दशक से ज्यादा फिल्म इंडस्ट्री में आपने काम किया , कैसा रहा आपका यह सफर?
अब तक बहुत ही अच्छा रहा है और आगे भी अच्छा रहेगा। मैं उन भाग्यशाली लोगों में हूं, जो इस इंडस्ट्री की पैदाइश हैं। मेरे पिता फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े हुए हैं उन्हें इंडस्ट्री में करीब 50 साल हो गए। मेरी परवरिश यहां हुई और मैं जानती हूं कि एक दिन में इंडस्ट्री में ही अंतिम सांस लूंगी। हर फील्ड, हर लाइन में कुछ ऊंच-नीच तो रहती ही है, मैं लकी हूं कि मेरे आसपास के लोग- फ्रेंड, फैमिली, मजबूती से मेरे साथ खड़े रहे और आज भी खड़े हैं। मैं चाहूंगी कि आगे भी उनका साथ ऐसे ही मेरे साथ बना रहे।

अपनी इस कामयाबी में परिवार को श्रेय देना चाहेंगी?
मेरे अचीवमेंट्स में मेरे परिवार का जो सबसे बड़ा सहयोग रहा शुरुआत में मेरा परिवार नहीं जानता था कि मैं इंडस्ट्री में आऊंगी। लेकिन जब मैंने यह फैसला किया कि मुझे फिल्में करनी हैं तो उन्होंने पूरा सपोर्ट किया। मेरी कोशिश हमेशा बैलंस लाइफ जीने की कोशिश की है। कभी यह नहीं सोचा कि फिल्म इज माई लाइफ। दरअसल, फिल्में मेरी जिंदगी हैं, लेकिन यह मेरी जिंदगी का हिस्सा हैं।

अपने करियर के उतार-चढ़ाव के दौर में आप खुद को बूस्ट-अप करने के लिए क्या करती थीं?
देखिए मुश्किल दौर में आपके साथ आपकी फैमिली होती है। पापा की सलाह हमेशा मेरे लिए काफी मायने रखती थी। पापा इस इंडस्ट्री से थे, उन्होंने भी काफी उतार-चढ़ाव देखे हैं। अप्स ऐंड डाउन तो होते ही हैं। इसकी लिए सब तैयार होते हैं। चढ़ते सूरज को हर कोई सलाम करता है। यह सिर्फ हमारी इंडस्ट्री में ही नहीं बल्कि हर जगह होता है। मुश्किल दौर में बस आपकी फैमिली का सपोर्ट होना जरूरी होता है क्योंकि यह ऐसा दौरा होता है जब आपको पता चलता है कि असल में आपका दोस्त कौन है और कौन आपके दोस्त नहीं हैं।

आपने कमर्शल फिल्म की हैं, साउथ की फिल्में की, टीवी शोज किए... कैसा रहा आपका अनुभव?
साउथ की ही नहीं, मैंने मराठी फिल्में भी की हैं, बंगाली फिल्में भी की हैं। लैंग्वेज फिल्में करने का मेरा अनुभव बहुत ही अच्छा रहा है यह मेरे लिए गर्व की बात है। फिल्म एक ऐसा जरिया है जो हमेशा यूनिटिड रहता है। कितनी भी पॉलिटिक्स क्रिएट करो लेकिन फिल्में अपने आर्ट और कल्चर से जुड़ी रहती है और कला सरहद की सीमाओं से जुड़ी नहीं है। इसके अलावा, टीवी शोज मैंने बहुत ज्यादा इंजॉय किया। यह टाइम काफी अच्छा रहा। मेरे बच्चे काफी छोटे थे इसलिए हफ्ते में एक दिन की शूटिंग के शेड्यूल से मैं आसानी से फैमिली और बच्चों को पूरा टाइम दे पाई।

शादी के बाद मस्त-मस्त गर्ल व्यस्त-व्यस्त गर्ल हो गई, तो कैसे मैंनेज करती हैं?
जी हां, शादी के बाद काफी व्यस्त शेड्यूल हो जाता है। अब मल्टि-टास्किंग करती हूं। बच्चों के क्लासेज भी याद रखने पड़ते हैं। कभी उन्हें स्विमिंग के लिए लेकर जाना होता है, कभी फुटबॉल, कभी टेनिस। बेटी कथक सीखती है तो वहां भी साथ जाती हूं। मां का रोल तो निभाना ही पड़ता है क्योंकि शादी के बाद प्रायॉरिटीज बदल जाती हैं। मुझे लगता है कि फिल्में जिंदगी भर आती-जाती रहेंगी पर बच्चों का बचपन फिर कभी वापस नहीं आएगा। मेरे लिए यही ज्यादा मायने रखता है।

फिल्मों के अलावा कौन-कौन से शौक हैं?

म्यूजिक सुनना, खुद को रिलैक्स करने के लिए टीवी शोज देखती हूं। क्रिकेट का बहुत शौक नहीं, लेकिन अब पति और बेटे की वजह से देख लेती हूं। मुझे बच्चों के साथ टाइम बिताना ज्यादा पसंद है।

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