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Wednesday, May 4, 2016

आम के बौर व गुड़ के अँचार जैसा चैत

परिचय दास

भारतीय परंपरा में पहला मास है - चैत । भारतीय वर्ष का अंत वसंत में, आरंभ भी वसंत में । अंत फागुन में, आरंभ चैत में। प्रकृति में परिवर्तन को देखते-देखते भारतीय वर्ष का अंत और आरंभ। चैत में दिन और रात; दोनों सुन्दर हो जाते हैं । आजकल पारिस्थितिकी के कारण दिन थोड़े तल्ख़ होने लगे हैं , यह अपवाद जैसा है. खैर. सरसों में फूल, आम में बौर । अद्भुत राग-रंग। वृक्ष-वृक्ष में नव पल्लव, प्रकृति में हरीतिमा , पेड़ों में नयी पत्तियां । कोयल की बांसुरी। चैत यानी चित्रा नक्षत्र से निसृत । चित्रमय प्रकृति। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से वर्ष के आरंभ करने का एक वैज्ञानिक आधार है । इंगलैंड के ग्रीनविच नाम की जगह से तिथि बदलने की व्यवस्था 12 बजे रात से है , उस समय भारत में सबेरे का 5:30 बज रहा होता है । हमारे भारत में रात के अंधकार में नववर्ष का स्वागत नहीं होता बल्कि भारतीय परंपरा का नववर्ष सूरज की पहली किरण के स्वागत कर के मनाया जाता है ।

चैत में अनुराग है , कहीं-कहीं विरह है । राम के जन्म का सोहर है । सोहर सुहावनी है । सुगंधित महीना। सारे फल-फूलों की खूबसूरत गंध। मन में आलोड़न। कसक। नव संवत्सर। सब कुछ नया-नया।

चैत- समय चइती की बहार रहती है । चैत - केंद्रित लोक-गीत । लोकगीत के अलावा इसको अर्ध-शास्त्रीय गीत विधा में सम्मिलित किया जाता और उपशास्त्रीय बंदिश गायी जाती हैं । चैत के महीना में गए जाने वाले इस राग के विषय प्रेम, प्रकृति और होली, राम जनम आदि होती हैं । चैत श्री राम के जन्म का भी मास है , इस लिए गीत की हर पंक्ति के बाद अक्सर 'रामा' शब्द लगाया जाता है । संगीत के कई महफिलें केवल चैती , टप्पा और दादरा गाया जाता है । यह अक्सर राग वसंत या मिश्र वसंत में निबद्ध होता है । चैती , ठुमरी, दादरा, कजरी इत्यादि का गढ़ पूर्वी उत्तर प्रदेश और मुख्यरूप से बनारस है । पहले केवल इसी के समर्पित संगीत समारोह होते थे , जिसको चैता उत्सव कहा जाता था । आज यह संस्कृति लुप्त हो रही है , किन्तु चैती की लोकप्रियता संगीत प्रेमियों में बनी हुई है । बारहमासा में चैत का महीना गीत-संगीत के मास के रूप में चित्रित किया गया है ।

चैत प्रतिपदा से भारतीय नववर्ष के प्रारंभ के साथ बड़ा नवरात्र शुरू हो जाता है । शक्ति की आराधना के लिए ये नौ दिन महत्वपूर्ण माने जाते हैं । इस दौरान घर में जौ बोये जाते हैं । हालांकि, कम ही लोग यह जानते हैं कि ऐसा क्यों किया जाता है । अधिकांश लोग तो बिना जाने परंपरा का महज़ निर्वाह करते चले आ रहे हैं । जौ को पूर्ण फसल कहा जाता है । वसंत ऋतु की पहली फसल जौ होती है , जिसे शक्ति को अर्पित किया जाता है । मान्‍यता तो यह है कि जौ उगाने से भविष्य से संबंधित कुछ बातों का संकेत भी मिलता है । यदि जौ तेजी से बढ़ते हैं तो घर में सुख-समृद्धि तेजी से बढ़ती है , ऐसी लोकमान्यता है । यानी जौ समृद्धि के प्रतीक हैं ।

इस समय सूखी , वीरान शाखा पर नाजुक कोमल कोंपल आनी शुरू हो जाती हैं , यहीं से वसंत ऋतु अपने उत्सव के शबाब पर पहुंचती है ।

फागुन व चैत वसंत के उत्सव के महीने हैं । इसी चैत के मध्य में जब प्रकृति अपने शृंगार के सृजन की प्रक्रिया में होती है । लाल, पीले , गुलाबी, नारंगी, नीले, सफेद रंग के फूल खिलते हैं । पेड़ों पर नये पत्ते आते हैं और ऐसा लगता है जैसे समूची की समूची की सृष्टि ही नई-नवेली हो गयी है । ठीक इसी समय हमारी भौतिक दुनिया में भी नये का आगमन होता है । नये साल का यही समय है : नये के सृजन का , वंदन, पूजन और संकल्प का । जब सृष्टि नये का निर्माण करती , आह्वान करती है , तभी सांसारिक दुनिया में भी वह नवीनता की ओर कदम बढ़ाती है । इस दृष्टि से कई जगहों पर गुड़ी पड़वा के इस समय मनाये जाने के बहुत गहरे अर्थ हैं । पुराने के विदा होने व नये के स्वागत का संदेश देता यह पर्व है - प्रकृति का , सूरज का , जीवन, दर्शन और सृजन का । जीवन-चक्र का स्वीकार, सम्मान व अभिनंदन तथा उत्सव है - गुड़ी पड़वा व चैत ।

किसान इस को रबी के चक्र के अंत के तौर पर मनाते हैं । चैत में भी में सूर्य का अर्घ्य [ छठ का ] दिया जाता है । घर की साफ-सफाई कर के सुंदर रंगोली बनायी जाती हैं । महाराष्ट्र और मालवा-निमाड़ आदि में घर के खिड़कियों पर गुड़ी लगाने को विशेष तौर पर शुभ माना जाता है । गुड़ी को राम की लंका विजय के तौर पर व महाराष्ट्र में छत्रपति शिवाजी के विजय की ध्वजा के तौर पर लगायी जाती है । लम्बी डंडी पर गहरी हरी या फिर पीली रंग की नई साड़ी लगाकर उस पर छोटा लोटा या फिर गिलास सजायी जाती है । उस पर काजल से आंख, नाक, मुंह बनाया जाता है और उस को फूल-हार से सजाके उस की अर्चना की जाती है । घरों में श्रीखंड व पूरनपोळी बनायी जाती हैं । आरोग्य की दृष्टि से नीम की टटकी पत्तियों का सेवन किया जाता है । इस तरह नये साल की शुरुआत वसंत के उत्सव के साथ सुख, समृद्धि व आरोग्य के संकल्प के साथ किया जाता है ।

चैती गीत का मूल स्रोत लोक संगीत ही है , किन्तु स्वर, लय आ ताल के कुछ विशेषता के कारण उपशास्त्रीय संगीत के मंचों पर बेहद लोकप्रिय है । इन गीतों के वर्ण्य विषय में शृंगार रस के संयोग आ वियोग, दोनों पक्ष प्रमुख होते हैं । अनेक चैती गीतों में भक्ति रस की प्रधानता होती है । चैत्र मास की नवमी तिथि को राम-जन्म का पर्व मनाया जाता है । इन गीतों को जब महिला या पुरुष एकल रूप में गाते हैं तो इसको ' चैती' कहा जाता है , किन्तु जब समूह या दल बना कर गाता जाता है तो इस को 'चैता' कहा जाता है । इस गायकी का एक और प्रकार है जिसको 'घाटो' कहा जाता है । 'घाटो' की धुन ' चैती' से थोड़ी भिन्न हो जाती है । इस की उठान बहुत ऊँच होती है और केवल पुरुष लोग इस को समूह में गाते हैं । कभी -कभी गायकों के दो दल में बाँट कर सवाल-जवाब या प्रतियोगिता के रूप में इन गीतों को प्रस्तुत किया जाता है , जिसको ‘ चैता दंगल' कहा जाता है । चैती गीतों का उपशास्त्रीय स्वरूप भी प्रसिद्ध है । चैती की भाव-भूमि तो लोक जीवन से प्रेरित होती है तथा प्रस्तुति ठुमरी अंग से कई गयी होती है - ‘चइत मासे चुनरी रंगइबे हो रामा।’

चैत मास की पूर्णिमा की रात के समय सरहुल [ उरांव जाति क जातीय नृत्य ] का आयोजन किया जाता है । यह नृत्य एक प्रकार से प्रकृति की पूजा का आदिम स्वरूप है । जनजाति लोगों का यह विश्वास है कि साल वृक्ष के समूह में, जिसको यहां 'सरना' कहा जाता है , उस में महादेव निवास करते हैं । जनजाति लोगों का बैगा सरना वृक्ष की पूजा करता है । वहाँ घड़े में जल रखके सरना के फूल से पानी छिड़का जाता है । इसी समय सरहुल नृत्य प्रारम्भ किया जाता है । सरहुल नृत्य के प्रारंभिक गीतों में धर्म प्रवणता व देवता की स्तुति होती है किन्तु जैसे-जैसे रात गहराती जाती है , उस के साथ -साथ नाच-संगीत मादक होने लगता है । यह नाच प्रकृति की पूजा का एक बहुत आदिम रूप है ।

लोककलाएं पहले उपजीं , परम्परागत रूप में उनका क्रमिक विकास हुआ तथा अपनी उच्चतम गुणवत्ता के कारण ये शास्त्रीय रूप में ढल गईं । चैती गीतों के लोक-रंजक-स्वरूप तथा स्वर व ताल पक्ष के चुम्बकीय गुण के कारण उपशास्त्रीय संगीत में इनको स्थान मिला । लोक परम्परा में चैती 14 मात्रा के चाँचर ताल में गायी जाती है , जिसके बीच-बीच में कहरवा ताल का प्रयोग होता है । गीतों की प्रचलित धुनों का जब सांगीतिक विश्लेषण किया जाता है तो हमको मालूम होता है कि दोनों तालों की मात्रा में समानता के कारण ही चैत गीत लोक व उपशास्त्रीय, दोनों स्वरूपों में लोकप्रिय है । भारतीय फिल्मों में चैती धुन का प्रयोग तो कई गीतों में किया गया है किन्तु धुन के साथ-साथ ऋतु के अनुकूल साहित्य का प्रयोग कुछ गिनी चुनी फिल्मी गीतों में मिलता है । 1963 में प्रेमचन्द के बहुचर्चित उपन्यास ‘गोदान’ पर इसी नाम से फिल्म बनी थी । इस फिल्म के संगीतकार विश्वविख्यात सितार वादक रविशंकर थे , जिन्होंने फिल्म के गीतों को पूर्वी भारत की लोकधुनों में निबद्ध किया था । लोकगीतों के विशेषज्ञ गीतकार अनजान ने फिल्म के कथानक, परिवेश व चरित्र के अनुरूप गीतों की रचना की थी । इन गीतों में एक चैती गीत था , जिसको मुकेश के स्वर में रिकार्ड किया गया था । गीत के बोल हैं - ‘हिया जरत रहत दिन रैन हो रामा…’।

चैत मास अपने स्वरूप में उत्सवधर्मी, ललित व विविधवर्णी है । कहीं निकल जाएँ , सांझ की वेला में सीवान में तो किसी सुगंध के झकोरे से आप का मन तृप्त हो जाएगा । आम के बौर, आम का टिकोरा, आम का गुड़ वाला अँचार ।

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