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Wednesday, April 27, 2016

मीडिया में पुरस्कारों का धंधा आज मुकाम पर ...


हम जमीन से जुड़कर पत्रकारिता करते हुए आज भी संघर्षशील हैं। कुछ पत्रकारों ने अपनी मेहनत से अच्छा मुकाम बनाया यह बात बहुत अच्छी है किन्तु विगत कई वर्षों से पत्रकारों की बाढ़ आ गयी है वह पत्रकार हैं जिन्होंने कभी देश के या समाज के हित में एक भी मौलिक शब्द नहीं लिखा है। बेरोज़गारी से तंग आकर या नया बिजनिस मान कर ही सही नया अध्याय तो देश की रीढ़ समझी जाने वाली मीडिया नामक संस्था ही दिया है। आज पत्रकारिता इस स्तर तक गिर चुकी है कि दलाल बन चुके पत्रकारों को पैसे लेकर पुरस्कार देकर प्रमाणित करने में कुछ मीडिया के ही लोग संस्था बना कर सक्रीय हो चुके हैं। आज कुछ पत्रकारों ने देश और समाज के लिए की जाने वाली पत्रकारिता को धंधा बना लिया है। अब धंधा है तो उसे ज़माने के लिए सारे प्रपंच और साम,दाम,दंड,भेद के नियम अपनाने होंगे। इसी कड़ी में आज आपको जगह जगह अपने सम्मान और पुरुस्कारों को ग्रेडिंग देते हुए दावा किया जा रहा है की "असली मीडिया में काम को हम प्रमाणित करके आपके जीवन और पत्रकारिता का स्तर बढ़ा सकते हैं।" कई सम्मान पुरुस्कार ऐसे हैं जो केवल पैसा लेकर दिए जा रहे हैं और पैसा देकर लेने वाला व्यक्ति चाहे पत्रकारिता के बारे में कुछ नहीं जनता हो,उसने कभी अपनी मौलिक लेख,सम्पादकीय अथवा समाचार कभी ना लिखा हो जिसके लिखने और राष्ट्र का निर्माण होता हो या देश का किसी भी प्रकार का नुकसान पहुंचने से बचता हो। मैंने अनुभव किया कि जब खुद पत्रकार से पूछा जाये की आपको पुरस्कार क्यों दिया जाये? जब उसका आर्थिक सामाजिक और सामाजिक स्टेटस पूछा जाने लगे तो समझो वह पुरस्कार नहीं धंधा है। क्योंकि किसी भी पत्रकार के काम को आंकने का तरीका यह है की पुरुस्कार देने वाली संस्था यह पता करे की किसने पत्रकारिता में देश सम्पदा बचाने में ,राष्ट्र निर्माण करने में.एकता स्थापित करने में कब और कितना योगदान दिया है जिसका असर देश निर्माण के लिए हुआ है। लेकिन एस मापदंड कहीं नज़र नहीं आता। पुरस्कारों की चयन समिति में ऐसे लोग सम्मलित हैं जो किसी खबर में फाइव डब्ल्यूवन एच का फार्मूला तक नहीं लगा सकते ! ऐसे में वह पत्रकारिता से अभिज्ञ लोग कैसे लोगों को चुनेंगे आप सहज अंदाजा लगा सकते हैं। 

सरकारी स्तर पर तो चयन सरकार के चरण चुम्बन की भाषा लिखने वालों का होता है यह तो पता था लेकिन मन आहात तब हुआ जब मेरे एक अभिन्न मित्र ने मुझे एक राष्ट्रीय पत्रकरिता अवार्ड में अपना आवेदन करने का लिंक भेज था। मैंने अपने कई पत्रकार मित्रों चर्चा करते हुए पूछा की ऐसे मुझे आवेदन में अपनी खुद लिखी प्रशंसा पर पुरस्कार लेना चाहिए अथवा आवेदन करना चाहिए की नहीं ? तो उन्होंने कहा करने में क्या जा रहा है ?
मैंने उनको सही बात करते हुए पत्रकारिता के बारे में जो गुरुजनों पढ़ा और सीखा था वह ज्ञान उन्हें बताया की पत्रकार का काम जमीनी हकीकत में दिखता है और जो पत्रकार बगैर स्वार्थ के समाज और राष्ट्र निर्माण में अनवरत कार्य करता रहता है उसे किसी दलाल संस्था के प्रमाण की अभी आवशयकता नहीं होती। उसकी लेखनी ही उसका पुरस्कार है और जिस जनता के सरोकारों को अपने अपने लेख या समाचार से पत्रकार पूरा करता है वह उसे दिल से चाहने वाले दर्शक और प्रशंसक होते हैं। अंततः मैंने उस पुरुस्कार के लिए आवेदन नहीं किया जो मुझे मेरे पत्रकारिता धर्म से विमुक्त करता हो। 

अशोक कुमार निर्भय
(BA,BJMC.PGD TRANSLATION & EDITING,CIC)
लेखक रिलेशन ऑफ़ इंडिया न्यूज़ के समाचार संपादक एवं वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार हैं

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