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Friday, December 18, 2015

बदलती धारणायेँ

डॉ.सरोज व्यास
प्राचार्या
इंदरप्रस्थ विश्व विद्यालय, दिल्ली 


कैसा महसूस कर रही है आप ? किसी एक द्वारा नहीं अनेकों के मुखारविंद से सुनने के बाद मैंने पति से पूछा –“आपको हमारे आचरण अथवा व्यवहार मे कोई परिवर्तन परिलक्षित हो रहा है क्या” ? प्रतिउत्तर मे उन्होने पूछ लिया –“किस संदर्भ मे जानना चाहती है आप” ? “सहयोगी, परिजन और मित्र सभी को लगता है, कि पुत्रवधू की उपस्थिति एवं स्वयं की पदोन्नति (माँ से सास) से मनस्थिति, दैनिक आचरण तथा व्यवहार मे बदलाव एवं प्रौढ़ता आना स्वाभाविक है, लेकिन मै इस प्रकार के परिवर्तन की अनुभूति से वंचित हूँ | आप भी सदैव कहते रहे हैं कि बहू आने से तुम्हारी सार्वभौमिक अक्षुण्णता खंडित हो जायेगी, परन्तु आप सबकी तथाकथित धारणाओं को ‘रेत के महल की भाँति धराशायी’ होते हुये मै देख रही हूँ” | मुस्कुराते हुये उन्होने कहा – “तुम बहू नहीं बेटी को घर लाई हो” ! संक्षिप्त वार्तालाप भले ही समाप्त हो गया हो, किन्तु अनगिनत घिसे-पिटे अर्थहीन प्रश्नों का सामना शायद अभी मुझे और मेरी ‘नन्ही परी’ (नववधू) को करना है | तत्स्वरूप विचारो के घोड़े स्वछंदता से बेलगाम मन मस्तिष्क मे दौड़ने लगे |

अतीत की स्मृतियों मे खो जाना अपेक्षित है, 30 वर्षों मे कितना कुछ बदल गया – मूल्य, रीति-रिवाज, परम्पराएँ, आदर्श एवं मान्यताएं इतना ही नहीं यदि कहूँ कि हमारी सामाजिक संरचना मे भी मूलभूत परिवर्तन हुआ है, तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी | @ समाज के साक्षर नहीं शिक्षित परिवारों मे बेटे-बेटी का भेद लगभग समाप्त हो गया है, सदियों से चली आ रही धार्मिक परम्परा“कन्यादान” नामक प्रथा के साथ-साथ इस शब्द का भी विरोध किया जाना वास्तव में संवैधानिक समानता के अधिकार को प्राप्त किये जाने का धोतक है | अपने विवाह मे कन्यादान को धार्मिक कर्म समझने वाले हमने महसूस ही नहीं अपितु स्वीकार भी किया कि निर्जीव वस्तुओं का दान संभव है, लेकिन इंसान को दान की वस्तु समझ लेना और दान करना अमानवीय परंपरा है और इसे समाप्त किया जाना अनिवार्य |

@ पितृपक्ष के मध्य शुरु किये गये दहेज विरोधी हवन को 20 वर्ष उपरांत पूर्णाहुति देकर मन प्रफुल्लित है | दहेज स्वरूप दैनिक उपयोग एवं उपभोग के साथ साथ अनिवार्य एवं सुविधाजनक संसाधनों के साथ बेटी की विदाई कभी स्वेच्छा से, कभी सामाजिक प्रतिष्ठा के कारण, तो कभी बेबसी वश होती है | रिश्तेदारों एवं परिजनों के लिये दिये जाने वाले उपहारों के पीछे छुपी मानसिकता का आज यदि मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से आंकलन करती हूँ तो स्वार्थी प्रवृत्ति उजागर होती है | दहेज शब्द केवल लड़की के अभिभावकों के लिये अभिशप्त हो ऐसा कदापि नहीं, लड़की मे अहम भाव, लड़के मे वैकल्पिक श्रोत की आशा और परिजनों में लालसा की भावना, उत्पन्न करने वाली इस परंपरा के परिणामों से हम अनभिज्ञ नहीं हैं | रिश्तों की धज्जियां प्रतिदिन न्यायालय में उड़ते देख रहे है |

@ मैथिली को जनक द्वारा विदाई पूर्व दी जाने वाली सीख मे समय के साथ बदलाव अवश्य आया, किन्तु इसकी सारगर्भिता यथावत है | 30 वर्ष पहले पिता की दहलीज़ से पिया घर कदम बढ़ाती पुत्री को कहे गये शब्द –“आज से तुम पराई हो गई हो, ससुराल से अपमानित होकर या उन्हें शर्मिंदा करके, इस दहलीज़ पर लौटकर कभी नहीं आना | इस कुल की प्रतिष्ठा लेकर विदा हो रही हो, उस कुल का अभिमान बनकर रहना, तुम्हारे किसी अनुचित आचरण, कर्म या वाणी के कारण हमारे पालन-पोषण और संस्कारों पर उंगुली उठी तो, समझ लेना “तुम हमारे लिये और हम तुम्हारे लिये मर गये” | वर्तमान मे राम-सीता को जनक उपदेश कुछ इन शब्दों में देते है- विवाह का निर्णय और जीवन-साथी का चयन, तुमने स्वेच्छा से किया है, –“तुम्हारे साथ किसी भी प्रकार की जबरदस्ती नहीं की गई, इसलिए किसी भी प्रकार का रोना-धोना स्वीकार्य नहीं होगा | दोनों परिवारों के प्रति समान दायित्व का निर्वहन करते हुये, तुम दोनों अपनी शैक्षिक योग्यता को अधिक श्रेष्ठ शिखर तक प्राप्त करोगे, अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतू प्रयत्न एवं कर्म तथा पिता एवं श्वसुर की संपत्ति के मोह से विमुख रहोगे | “यदि व्यक्तिगत विचारधारा एवं व्यवसायिक प्रगति मे तुम्हारा पति बाधक बनता है तो नि:संकोच मेरे पास लौट आना, वैवाहिक बंधन से मुक्त होने मे तुम्हारी सहायता मैं निसंदेह करूँगा” | शब्दों की कठोरता को यदि अनदेखा कर दिया जाये तो उपदेश यथार्थ में समय, काल एवं परिस्थिति के अनुकूल है, इस कथन की तार्किक पुष्टि की जा सकती है |

@ सोनिया गाँधी जी ने अपनी सुविधा जनक पाश्चात्य वेषभूषा का परित्याग भावनाओं में बहकर नहीं किया, निसंदेह कारण राजनैतिक कूटनीति रही है, क्योकि भारतीय नारी के सौंदर्य, सादगी और संस्कारित होने का प्रतीक साड़ी को समझा जाता है | अंतर्राष्ट्रीय संदर्भ में यह तथ्य प्रमाणित है कि, लड़कियों एवं महिलाओं के परिधान से वैवाहिक स्थिति का आंकलन नहीं किया जा सकता, तथापि भारतीय संस्कृति में राज्य, धर्म एवं जाति आधारित वेषभूषा (साड़ी एवं सलवार-कुर्ता) की “लक्ष्मण रेखा” को लांघने का साहस परंपरागत निम्न एवं मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए बेहद चुनौती पूर्ण हैं | विवाह से पूर्व साड़ी पहनने का प्रचलन मेरी जानकारी के अनुसार किसी भी राज्य में नहीं, परन्तु विवाह विधान के प्राथमिक चरण से ही इसे अनिवार्य कर दिया जाता है, लेकिन क्यों ?

एक लड़की के लिए हास्यप्रद स्थिति तब उत्पन्न हो जाती है, जब मुँह ढकने की परम्परा को निभाने में सम्मोहक अंग नाभि एवं कमर आकर्षण का केंद्र बन जाते हैं | समय, आवश्यकता एवं अवसर की नज़ाकत को युवा हमसे बेहतर समझते हैं, अत: वेषभूषा का चुनाव परम्परा के निर्वाह का मापदंड नहीं होना चाहिए |

20 दिन की अवधि निश्चित रूप से पर्याप्त नहीं है, किसी भी परिस्थिति और मनस्थिति के मूल्यांकन के लिए, लेकिन यदि प्राचीन काल से चली आ रही कहावतों पर विश्वास किया जाये तो यह कहना भी शीघ्रता नहीं होगा कि –“पूत के पाँव पालने में ही नज़र आ जाते है”, बहू को बेटी की उपमा देने से अधिक बेटी होने का अहसास कराया जाना अपेक्षित है, इसके बाद निर्विवाद सत्य को सिद्ध किये जाने कि गुंजाईश नहीं कि, पुत्र की तुलना में पुत्रियाँ अधिक संवेदनशील, समर्पित और स्नेही होती है !!

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