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Saturday, December 28, 2013

मातृ-शक्ति


नवीन कुमार 

या देवी सर्वभूतेशु मातृ रूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।


सभी भूतों में मातृरूप से स्थित देवी को नमस्कार है, नमस्कार है नमस्कार है। वह कौन-सी शक्ति है जो सभी भूतों-जड़ तथा चेतन- में मातृरूप से स्थित है ? माता होना तथा मातृरूप में स्थित होना दोनों अलग-अलग बातें हैं । यहां पर ‘मातृरूप’ की बातें की गई हैं जिसका अर्थ हैं मातृत्व अर्थात् निर्माण करने वाले गुणों का । ये गुण किसी में भी हो सकता है - जड़ में भी तो चेतन में भी, पुरूष में भी तो स्त्री में भी तथा किसी अन्य जीव-जन्तु में भी । लोक व्यवहार में हम जननी तथा माता को समानार्थी शब्द की तरह व्यवहार करते हैं। परन्तु दोनों के अर्थो में भिन्नता है। जो जन्म दे वह जननी है तथा जो निर्माण कर दे वह माता है। महर्शि यास्क ने भी इसी तरह की व्याख्या की है - जन्मदात्री शक्ति अगर जननी है तो निर्माणकर्तृ शक्ति माता है। हमारी संस्कृति में इसीलिए देश, नदी, पहाड़, गौ, गीता, पृथ्वी इत्यादि निर्माणकर्तृ शक्ति को माता की संज्ञा दी गई है तथा सभी मातृ-शक्तियों के प्रति महान श्रद्धा प्रकट की गई है । इस तरह से कोई पुरूष भी यदि हमारा निर्माण कर दे तो भी वे हमारे लिए मातृरूपेण पूज्य है। जन्मदात्री जननी हमें जन्म तो देती है परन्तु इसके बाद हमारा निर्माण गौ माता, गंगा नदी माता, गीता माता (ज्ञान देकर), पृथ्वी माता इत्यादि ही करती हैं। 

गाय हमारी सेवा बिना किसी भेदभाव - जाति, वर्ण, लिंग, धर्म, सम्प्रदाय का ध्यान रखते हुए मातृवत् करती रहती है। हमसे कुछ भी लिये बिना दुग्ध, दही, घी इत्यादि देकर हमारा निर्माण करती है। यहाँ तक कि अपना वध करने वालों को भी अपना सर्वस्व देती है क्योंकि गाय माता है। पुत्र कुपुत्र हो सकता है पर माता कुमाता नहीं होती। गायें हमारी ही नहीं सम्पूर्ण विश्व की माँ है - ‘गावो विष्वस्य मातरः’। इतना ही नहीं गायें केवल मनुष्यों की ही नहीं सभी प्राणियों की भी माता है - ‘मातरः सर्वभूताना गावः सर्वसुखप्रदा (महाभारत अनु.69/7)’ गौएं समस्त प्राणियों की माता सदृश सर्वविध सुखों को देने वाली है।

गौ माता की तरह गीता भी हमारी माता है क्योंकि गीता ज्ञानयोग, भक्तियोग तथा कर्मयोग इत्यादि के द्वारा हमारा जीवन-निर्माण करती है। इसमें किसी मत का खंडन-मंडन नहीं है। किसी भी धर्म या सम्प्रदाय की बातें यहाँ नहीं हैं। गौ माता की तरह गीता भी सम्पूर्ण विश्व की माता है। अतः विश्व ग्रन्थ है।

पृथ्वी तो सभी भूतों को धारण करती है - सभी भूतों का आश्रय स्थल है - राजा, रंक, फकीर, न्यायी, अन्यायी सभी को बिना किसी भेद भाव के। माता के समान यह क्षमाशील है अतः इसका एक नाम क्षमा भी है। तभी तो हमारे ऋशियों ने पृथ्वी को भी माता कहा है - ‘माता भूमि पुत्रोहं पृथ्वीव्याः।’ हम सभी जड़ तथा चेतन की माँ है पृथ्वी माता। अतः इस पृथ्वी पर रहने वाले सभी जड़ तथा चेतन - एक कुटुंब(परिवार) है - वसुधैव कुटुंबकम्।

अतः जिस शक्ति के द्वारा निर्माण होता है वही मातृशक्ति है। मातृशक्ति के बिना तो जन्मदात्री शक्ति की कल्पना भी नहीं कर सकते। इसी उदात्त भावना को मूर्तरूप देकर हम सभी मातृशक्ति अर्थात् निर्माणकर्तृ शक्ति की वन्दना करते हैं। मातृशक्ति सभी भूतों -जड़ तथा चेतन - में व्याप्त है। हमारे मनीशियों ने अपनी ज्ञान चक्षु से इस शक्ति को प्रकट किया, पहचाना तथा हमें भी उसे पहचानने में प्रेरित किया  इसीलिए हम सभी नवरात्रों के अवसर पर भी इसी मातृशक्ति का आह्नान करते है - जिससे नई शक्ति, नई उर्जा लेकर निर्माण कार्य अर्थात् संरचनात्मक कार्य कर पाते हैं। हमारे शास्त्रों में भी ईश्वर के अवतार का उद्देष्य केवल ‘परित्राणाय साधूनाम्’ तथा ’विनाशाय च दुश्कृताम‘ के लिए ही नहीं है - वह होता है ‘तदात्मानं सृजाम्यहम’ के लिए भी । ‘विनाश’ ‘परित्राण’ तथा ‘सृजन’ का कार्य साथ-ही-साथ होता है। विनाश करते हैं अज्ञानता का, अभाव का, परित्राण करते है सज्जनता का तथा साधूता का और सृजन करते हैं - ज्ञान का, आलोक का। अज्ञान का विनाश होते ही ज्ञान का सृजन तथा समुत्सुक जनों का परित्राण एक ही साथ होता। अतः अवतार का उद्देष्य तब तक पूरा नहीं होता जब तक की सृजनात्मक शक्ति अर्थात् मातृशक्ति का उन्मेश नहीं होता है। इसी अर्थ में गीता में भगवान् के उदघोष ‘तदात्मानम् सृजाम्यहम’ शब्द की महत्ता भी है अन्यथा विनाश तथा परित्राण तो साधारण मनुष्य भी कर ही सकता है। आज सारे संसार में हाहाकार मचा हुआ है। परित्राण करने के नाम पर विनाश का साजो सामान इकट्ठा किया जा रहा है। यहाँ तक कि नये आविष्कार अर्थात् सृजनात्मक शक्ति का सहारा विनाश के लिए ही हो रहा है। विकास के नाम पर धरती, आकाश, जल, वायु, अन्तरिक्ष को भी प्रदूशित किया जा रहा है। स्थिति भयावह है। अतः इससे बचने का एक ही उपाय है - मातृशक्ति का आह्नान। मातृशक्ति के आह्नान का अर्थ है - अपने भीतर एक नई उर्जा की उत्पत्ति जो अज्ञानता का नाश कर ज्ञान के आलोक से हम सभी के अन्तरतम को आलोकित कर दे।

आइये चलें हम उस मातृशक्ति के - निर्माणकर्तृ शक्ति के शरण में जो आंतरिक तथा बाह्यरूप से हमारा परित्राण करे -

”शरणागत दीनार्त परित्राण परायणे।
सर्वस्यार्तिहरे देवी नारायणि नमोस्तुते“


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