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Sunday, December 22, 2013

कलियुग की वेदना

मधुरिता  

काल का विभाजन नहीं किया जा सकता क्योंकि उनका न आदि है न अंत  हिन्दू काल गणना के मुताबिक मनुष्यों में कर्मों की प्रधानता के हिसाब से चार युगों मैं बांटा गया है. सत युग, त्रेता युग, द्वापर युग तथा कलियुग. अभी अलीयुग चल रहा है इसकी हमेशा लोग बुराई ही करते हैं -- यदा कदा कोई भी कलियुग को गाली देता है -- कैसा घोर कलियुग आ ----------------

समय काल योग कभी दोषी नहीं होता कर्म ही अच्छे बुरे होते हैं -- जो युग का निर्माण करते हैं.

तमो गुण की बहुलता होने के कारण ना - ना - ना - ना - विचार रोम रोम में भर गए हैं. जब भी कोई काम करने की सोचते हैं - तो इस ना सोच के कारण निराशा पहले ही हमारे आगे खड़ी हो जाती है. अपने अंदर भी निराशा शोक और भय के साथ आती है, जिससे भटकाव की स्तिथि हमेशा बनी रहती है. प्रत्येक कर्म दोषावृति से करने से उसका परिणाम भी नकारात्मक ही होता है.

दूषित विचार अंतः करण में विनाश कारी आचरण करने को मजबूर कर देती है, जिससे हम बुरे कर्मों को करने लगते हैं, तनिक भी सोचते नहीं कि इसका परिणाम कितना भयावह होगा.

आसुरी संपत्ति का बोलबाला हो जाता है. लोग घमंडी पाखंडी धोखा देना झूठ - फरेब, क्रोध दम्भी व् इंद्रियों का गुलाम होना आदि अनेक विकृतियां स्वभाव में आ जाती हैं. बेचारा कलियुग बदनाम हो जाता है.

वेदों व शास्त्रों -पुराणों की व्याख्या अनर्थ कारी हो गया है. बुद्धि अहंकार के करण अपने को ही सही मानते हैं. किसी से बात करो तो कहते हैं -- पता है, पता है - दूसरों की बात भी सुनना पसंद नहीं करते. उनकी अवहेलना करते हैं. माता पिता जो हमारे बारे में अच्छा सोचते हैं हमारी मदद करते हैं उसे भी हम कहाँ बक्शते हैं --------.

परमपिता परमात्मा को पाने में सेंकडों जन्म लग सकते हैं. बुढ़ापे में भजन कर लेंगें. कर्म करते समय नकारात्मक विचारों के अधीन होकर यही सोचते रह जाते हैं कि इसका फल हमें नहीं मिलेगा -----. कहीं हमसे ये सुख छिन न जाए, इसी आशा में सारा जीवन ही निकल जाता है.

विश्वास की जगह अन्धविश्वास ने ले लिया है. भगवान् पर विश्वास तो पहले ही खो चुके हैं. हमारी निराशा का यही मुख्य कारण है. हमें अपने कर्म, रिश्ते -माता पिता बच्चे व् यहाँ तक अपने आप का भी भरोसा नहीं रहा. इस वजह से हम किसी भी एक कार्य को ज्यादा समय व् स्थिर बुद्धि से नहीं कर पाते जिससे हमें सफलता व् संतुष्टि प्राप्त नहीं हो पाती.

अपनी असफलता के लिए हमेशा दूसरों को दोषी ठहराने की आदत बन जाती है. इससे सारे सम्बन्धों की नीव अपने स्वार्थ पूर्ति तक सीमित रह गए है. सभी सम्बन्धी व् दोस्तों के रहते हुए भी हम अंजानो की तरह अकेले जीवन व्यतीत कर रहें हैं.

पुराना नकारात्मक विचारों के कारण किसी के बारें में बुरा बोलना -सोचना इतना गहन असर दिखाता हैं कि -- हम किसी के सुख से दुःख का अनुभव करते हैं. कोई उन्नत्ति करे तो ईर्ष्या होती है. भाई भाई का दुष्मन बन जाता है. पति पत्नी में, तू तू मैं मैं होती रहती है बच्चे पीछे क्यों रहें वो भी तो इससे अछूते नहीं रहे ------

इसकी निवृति के लिए हमें सकारात्मक सोच का सहारा लेना पड़ेगा. अरे भई जब मशीन की भी सफाई करनी पड़ जाती है तो हमारे अंतकरण को बीच बीच मैं स्वच्छ करने की भी आवश्यकता होती है. उसे हम अपने अच्छे विचारों से, शास्त्र सम्मत ज्ञान से, व्यवहार को संशोधित करने के अभ्यास से, व् स्वतः सिद्ध नित्य सम्बन्ध जो भगवान् के साथ हमारा है, उसकी सार्थकता से शुद्ध कर सकते हैं.

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