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Tuesday, May 21, 2013

संवेदना


डॉ सरोज व्यास
प्रधानाचार्य, इंदरप्रस्थ विश्व विद्यालय, दिल्ली

आभा की आयु और पद को देखकर उसके संवेदनशील मानवीय ह्रदय को समझना मुश्किल है | उच्च पद पर आसीन एक कुशल प्रबंधक, निदेशक और शिक्षिका के रूप में देश- विदेश में अपनी पहचान विद्वता तथा कर्मठता के बल पर बनाने वाली, व्यक्तिगत स्तर पर भावुक, सहनशील, दयालु एवं सह्रदय है | इतना तो श्यामा गत तीन वर्षों में जान चुकी थी किन्तु कल की घटना ने श्यामा को आश्चर्यचकित कर दिया |

आभा जब भी उसके यहाँ आती है तब वे दोनों अधिक से अधिक  समय साथ में बिताने का प्रयास करती हैं, रात में जब दोनों शयन कक्ष में विश्राम के लिए गयी, तब आभा अचानक जोर-जोर से हंसने लगी | श्यामा आश्चर्यचकि थी, उसके अकारण हंसने पर | बनावटी क्रोध के भाव चेहरे पर लाते हुए श्यामा ने उससे पूछा कि अचानक तुम्हें क्या मिल गया ? श्यामा के प्रश्न को निरुत्तर छोड़कर हंसते हुए ज़ोर-ज़ोर से वह श्यामा के पति  मोहन को पुकारने लगी “ मोहन जी ज़रा इधर आइये तो ” | मोहन उन दोनों के समक्ष जिज्ञासा के भाव लिए यह जानने को आतुर थे कि आखिर इतनी रात उन्हें किस विषय में वार्तालाप करने के लिए आमंत्रित किया गया है | कुछ समय प्रतीक्षा के बाद मोहन जी ने पूछा “कहिये न आभा जी क्या कहना चाहती हैं ”? आभा ने स्वयं की हंसी पर काबू करते हुए कहा कि - क्यों हम लोग अभौतिक वस्तुओं के प्रति भी संवेदनशील हो जाते हैं ? दैनिक जीवन में उपयोग की जाने वाली निर्जीव वस्तुओं से प्रेम और आत्मीयता का सम्बन्ध स्थापित कर लेते हैं ? आज तक मुझे लगता था कि मैं ही भावात्मक स्तर पर कमज़ोर हूँ।  लेकिन आपके व्यवहार और व्यक्तित्व को नज़दीक से देखकर खुश हूँ कि मुझ जैसे लोग और भी हैं |

आभा ने मोहन जी को श्यामा से यह कहते सुन लिया था कि  “बहुत बुरा हुआ”! वह केवल इतना सुनकर ही इस निष्कर्ष पर नहीं पहुंची थी अपितु गत दो दिनों से वह मोहन जी के व्यवहार का निरंतर और व्यापक मूल्यांकन कर रही थी | श्यामा के घर का बीस साल पुराना फ्रिज खराब हो गया था | फ्रिज क्या खराब हुआ घर का वातावरण ही ग़मगीन हो गया | श्यामा को भी फ्रिज के खराब होने का दुःख था किन्तु वह भावुक होने के साथ-साथ व्यवाहरिक भी है, उसे इस सत्य को स्वीकार करने में तनिक भी समय नहीं लगा कि संसार में प्रत्येक वस्तु एवं व्यक्ति नश्वर है, जन्म के साथ मृत्यु तथा उत्पत्ति के साथ अंत निश्चित है | मोहन के व्यवहार से आभा ही नहीं घर के अन्य सदस्य भी अचंभित थे | अंतिम सांसे लेते घर के फ्रिज को बचाने का हर संभव प्रयत्न सुबह से ही मोहन करने में लगे थे, मैकेननक ने जांच के बाद घोषणा कर दी थी कि इसका समय पूरा हो गया है लेकिन मोहन कहाँ मानने वाले थे | उन्होंने फ्रिज की पुनुः जांच हेतु अपने इंजिनियर मित्र से घर आने का आग्रह किया। मित्र ने भी मोहन को सांत्वना देते हुए कहा “चिंता नहीं कीजिये थोड़ी देर में यह चलने लगेगा” | उपचार की प्रक्रिया हास्य से परिपूर्ण थी, मोहन और उनके दोस्त फ्रिज को ठंडे पानी की पट्टियाँ चढ़ा रहे थे | कुछ समय के लिए फ्रिज स्वस्थ भी हुआ लेकिन छणिक खुशी देखकर उसने चलना बंद कर दिया | भारी मन से मोहन के मित्र छमा याचना के भाव चेहरे पर लेकर विदा हुये | श्यामा ने झुंझलाकर कहा “प्लीज मोहन अब बस भी करो, एक दिन हमारा भी अंत होगा और आप है सुबह से फ्रिज का रोना रो रहे है”|

मोहन से अपने संवेदनशील व्यक्तित्व  के भावों को बाँटते हुए आभा की मुखाकृति से स्पष्ट प्रतीत हो रहा था कि वह अपनी अतिप्रिय वस्तु को याद कर जैसे अभी रो पड़ेगी | आभा मोहन जी से कह रही थी “ पता है मोहन जी ! जब मैं १६ वर्षम की थी, तब मां को कैंसर हो गया था | मैं अपने भाई के साथ माँ को ईलाज के लिए बैंकोक लेकर गयी | वहां हम एक होटल में ठहरे | मुझे अपने एक जोड़ी जूते अतिप्रिय थे | ईलाज के भाग-दौड़ में उनकी तली निकल  गयी | माँ के ओपरेशन के बाद जब स्वदेश लौटने लगे तब भाई एवं अन्य परिजनों के आग्रह मिश्रित आदेशानुसार टूटे जूतों को कमरे में ही छोड़ना पड़ा | कमरे से बाहर निकलते हुए मैं महसूस कर रही थी कि वे मुझसे दयनीय भाव से याचना कर रहे थे कि - प्लीज़ तुम इस तरह मुझे परदेश में छोड़कर मत जाओ ! तुम मेरे बिना नहीं रह पाओगी | हम दोनों कितने वर्षों से साथ हैं | आज मैं अपाहिज क्या हुआ तुम लोगों के बहकावे में आकर मुझसे नाता तोड़ मुझे अकेला छोड़ कर जा रही हो ” ? आभा बोले जा रही थी – “ मैं भारी मन से उन्हें वहीं छोड़कर नीचे आ गयी , तभी अचानक मोहन जी मुझे उनके रोने की आवाज़ सुनाई दी और मैं – एक  मिनट  रुको , अभी आती हूँ।  कहकर होटल की सोलहवीं मंजिल पर दौड़कर गयी और अपने जूतों को उठाकर सीने से लगा लिया | मुझे जूतों के साथ देखकर भाई ने कहा – पागल हो गयी ये लड़की | मुझे न किसी की टिप्पणी की परवाह थी और न ही कोई संकोच | होटल से लेकर स्वदेश तक उन्हें अपने हाथों में उठाये बस इसी संतोष से आनंद-विभोर थी कि मैं स्वार्थी और निर्दयी नहीं हूँ | इतना कहते –कहते आभा की आँखों में पानी उतर आया और एक पल के लिए शयनकक्ष  में मौन का साम्राज्य छा गया | कुछ देर बाद श्यामा ने चुप्पी तोड़ते हुए पूछा - आभा तुम्हारे वे जूते अब कहाँ हैं ? आभा हंसे जा रही थी, उसने प्रतिप्रश्न  किया  – आज जहां लोग सजीव वस्तुओं, जीते-जागते व्यक्तिओं , बहुमूल्य रिश्तों तथा मानवता को शर्मशार कर रहे हैं वहां निर्जीव वस्तुओं के प्रति मोह , लगाव और संवेदना को व्यक्त  करना पागलपन से अधिक कुछ भी नहीं है |

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